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एमपी में विरासत पर जंग, बंदुक पर मालिकाना हक, बना रहा भाईयों में विवाद

ग्वालियर-चंबल। बंदूके अब सुरक्षा से कही ज्यादा रूतबें का प्रतीक बनती जा रही है, यही वजह है कि इस विरासत के मालिकाना हक को लेकर भाईयों में विवाद भी बढ़ रहे है। मध्यप्रदेश का एक ऐसा क्षेत्र जो कि बंदूको के लिए जाना जाता है। वह है ग्वालियर-चंबल का क्षेत्र। यहां लाइसेंसी बंदूको की सख्या काफी ज्यादा है, लेकिन अब पिता की मृत्यु के बाद लाइसेंसी बंदूकों (विरासत) को लेकर भाइयों में विवाद का कारण न सिर्फ बन रही है बल्कि विवाद तेजी से बढ़ रहे है। संपत्ति और रुतबे के प्रतीक माने जाने वाले इन हथियारों के मालिकाना हक के लिए कई परिवार अदालतों और थानों के चक्कर काट रहे हैं।

पारिवारिक कलह के प्रमुख कारण

उत्तराधिकार के लिए जो नियम है वह भारतीय शस्त्र अधिनियम के तहत पिता की मृत्यु के बाद लाइसेंसी हथियार स्वतः किसी एक वारिस को ट्रांसफर नहीं होते। इसके लिए परिवार के सभी सदस्यों को कानूनी रूप से अनापत्ति प्रमाण पत्र देना पड़ता है, लेकिन यह प्रमाण पत्र अब विवाद की जड़ बन रहा है। जब भाइयों के बीच संपत्ति बंटवारे को लेकर अनबन होती है, तो वे एक-दूसरे को हथियार सौंपने पर आपत्ति जताते हैं। कई मामलों में सभी भाई लाइसेंस अपने नाम करने की जिद करते हैं, जिससे विवाद बढ़ जाता है।

थानों में जमा हो जाते है हथियार

बंदूकें प्राप्त करने एवं उसके लाइसेंस के लिए परिवारिक विवाद बढ़ने पर पुलिस और प्रशासन की भूमिका अंहम हो जाती है। सहमति न बनने की स्थिति में जिला प्रशासन या पुलिस विभाग द्वारा हथियार को जब्त (जमा) करवा लिया जाता है, जब तक कि कोर्ट या एसडीएम कार्यालय से कोई स्पष्ट आदेश न आ जाए।

ऐसे है रास्ते

चंबल संभाग (भिंड, मुरैना, ग्वालियर, दतिया, श्योपुर, शिवपुरी) में बंदूकों को सामाजिक रूतबे और आत्मरक्षा से जोड़कर देखा जाता है, जो इस विरासत की जंग को और अधिक आक्रामक बना देता है। ऐसी परिस्थितियों से बचने के लिए कानूनी विशेषज्ञों की सलाह पर आपसी सहमति (फैमिली सेटलमेंट) बनाना या फिर हथियार को प्रशासन के पास जमा करवाकर प्रक्रियागत रूप से किसी एक उत्तराधिकारी के नाम लाइसेंस ट्रांसफर कराना सबसे उचित विकल्प माना जाता है।

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