कैसा है ,ए.आर.रहमान के संगीत का जादू जिसे सुनकर लोग झूमने लगते हैं !

RAAM (1)

Happy Birthday A .R. Rahman : मौसिक़ी मेरी इबादत है खुदा की तलाश का ज़रिए यही मेरी चाहत है,
रूबरू होता हूँ, जिस फन की बदौलत उससे ,ये उसी की नेमत है। बात हो रही है बड़ी धीमें और सुरीले अंदाज़ में बोलने वाले ए आर रहमान की।

कभी कभी तो ये लगता है कि जाने कैसा जादू है ए. आर. रहमान के संगीत में जो शास्त्रीयता को भी छूता है और समकालीन वाद्यों को भी मगर कुछ ऐसा अद्भुत संगीत रचता है जो इंक़लाब ला देता है उनकी मौसिक़ी का हर क़तरा कुछ ऐसे राज़ खोलता है जो हमने न पहले देखे न सुने फिर उन धुनों को गीत में पिरोते कैसे।

पहली दफा कब दिखा इसका सुरूर :-

ए. आर. रहमान के संगीत का ये करिश्मा किसी दायरे में नहीं बंधा और बॉलीवुड-हॉलीवुड से लेकर हर पीढ़ी के लोगों को अपनी आग़ोश में लेता गया। पहली बार ये करिश्मा सबने महसूस किया फिल्म ‘रोजा’ में ,इसका टाइटल सांग तो आज भी जवाँ धड़कनों में समाया है जो कर्नाटक संगीत और आधुनिक संगीत का मिश्रण है ,जी हाँ बोल हैं – ‘रोजा जानेमन …’
‘दिल से’ फिल्म के गीतों के लिए तो शायद हमारे शब्द कम पड़ जाएँ क्योंकि इनकी तर्ज़ और धुन जो जोश पैदा करती है वो इस गाने के फिल्मांकन को भी सार्थक करता है जिसकी वजह से ये गानें आज भी एक अनमोल कृति बने हुए हैं ,फिर चाहे शीर्षक गीत हो या ‘चल छइयाँ छइयाँ ..; हो।

ए. आर रहमान के संगीत में डूबे इन गीतों में पारम्परिक वाद्यों के साथ नए ज़माने के इलेक्ट्रॉनिक इंस्ट्रूमेंट भी हमें सुनने को मिलते हैं ऐसा ही एक गीत है, ‘गुरू’ फिल्म से ‘तेरे बिना…’ जो कुछ सूफियाना इश्क़ को न केवल अपने बोलों से बल्कि धुन से भी बखूबी बयाँ करता है।
एआर रहमान अपने संगीत में इतने प्रयोग शायद इसलिए भी कर पाते हैं क्योंकि इन धुनों को बोलों में ढालकर गाना भी जानते हैं और ऐसा ही कुछ उन्होंने इस गाने में भी किया है ,इसलिए चिनमयी और मुर्तुज़ा खान के साथ आप उनकी भी सुरीली आवाज़ सुन सकते हैं। ए आर रहमान के संगीत निर्देशन में जहाँ एक तरफ वंदे मातरम ,ने देशभक्ति की नई लहर जगा दी तो वहीं दूसरी तरफऑस्कर जीतने वाली धुन ने ‘जय हो …’ गीत के साथ पूरे विश्व में भारत की विजय पताका फहरा दी।

सूफियाना कलाम करते हैं कुछ और पुरअसर अपील :-

सूफियाना कलाम को तो बड़े पुर -असर अंदाज़ में पेश करते हैं ए आर रहमान, फिर इनमें क़व्वाली का अंदाज़ मिल जाए तो कहने ही क्या इसके बहोत से उदाहरण वो हमें दे चुके हैं’ दिल्ली 6′ फिल्म की ‘मौला मौला… ‘,रॉकस्टार’ फिल्म की ‘कुन फया कुन. ..’ और’ फ़िज़ा’ फिल्म की ‘पिया हाजी अली. ..’ क़व्वाली के ज़रिये।


अल्लाह रक्खा रहमान यानी ए.आर. रहमान के संगीत का जादू आप हिन्दी और तमिल के अलावा भी कई भाषाओं की फिल्मों में महसूस कर सकते हैं। 6 जनवरी, 1967 को चेन्नई, तमिलनाडु, में पैदा हुए रहमान साहब का पैदाइशी नाम था ‘अरुणाचलम् शेखर दिलीप कुमार मुदलियार’ लेकिन परिवार के धर्मपरिवर्तन के बाद वो अल्लाह रक्खा रहमान हो गए।

कैसे पहुँचे ऑस्कर तक :-

यहाँ आपको ये भी बता दें कि रहमान गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड से सम्मानित होने वाले पहले भारतीय हैं। ए.आर. रहमान वो पहले भारतीय भी हैं जिन्हें ब्रिटिश भारतीय फिल्म ‘स्लम डॉग मिलेनियर’ में उनके संगीत के लिए दो ऑस्कर पुरस्कार मिले हैं ,इसी फिल्म के गीत ‘जय हो’ के लिए सर्वश्रेष्ठ साउंडट्रैक कंपाइलेशन और सर्वश्रेष्ठ फिल्मी गीत की श्रेणी में दो ग्रैमी पुरस्कार भी मिले। एआर रहमान को कला और संगीत में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए वर्ष 2000 में भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘पद्म श्री’ से सम्मानित किया गया था। टाइम्स पत्रिका ने तो उन्हें (mozart) मोज़ार्ट ऑफ मद्रास की उपाधि दी है।

कैसे लगी संगीत की धुन :-

अल्लाह रक्खा रहमान के पिता राजगोपाल कुलशेखर यानी (आर. के. शेखर) मलयालम फ़िल्मों में संगीतकार थे इसलिए ए. आर रहमान को संगीत अपने वालिद से विरासत में मिला फिर उन्होंने मास्टर धनराज से संगीत सीखा। रहमान जब नौ साल के थे तब उनके पिता के गुज़र गए और घर के हालात इतने बिगड़ गए कि पैसों के लिए पिता के वाद्य यंत्रों को भी बेचना पड़ा। इसी बीच उनके परिवार ने इस्लाम धर्म अपनाया बैंड ग्रुप में काम करते हुए ही उन्हें लंदन के ट्रिनिटी कॉलेज ऑफ म्यूज़िक से स्कॉलरशिप भी मिली, जहाँ से उन्होंने पश्चिमी शास्त्रीय संगीत में डिग्री प्राप्त की। रहमान महज़ ग्यारह बरस के थे तभी अपने दोस्त शिवमणि के साथ मिलकर बैंड रुट्स के लिए सिंथेसाइजर बजाने लगे और इलैयराजा के बैंड से भी जुड़ गए थे। रहमान की-बोर्ड, पियानो, हारमोनियम और गिटार भी बजा लेते है। वे सिंथेसाइजर को कला और टेक्नोलॉजी का अद्भुत संगम मानते हैं। चेन्नई के “नेमेसिस एवेन्यू” बैंड की स्थापना का श्रेय रहमान को ही जाता है।

कैसे हुए फिल्मों में एंट्री :-

1991 में रहमान ने अपना खुद का म्यूजिक रिकॉर्ड करना शुरु किया था और 1993 में उन्हें फिल्म डायरेक्टर मणिरत्नम ने अपनी फिल्म ‘रोजा’ में संगीत देने का न्योता दिया। फिल्म म्यूज़िकल हिट रही और पहली फिल्म में ही रहमान ने फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता लिया । इस पुरस्कार के साथ आरंभ हुआ रहमान की जीत का सिलसिला जो आज तक जारी है। आज वे विश्व के टॉप टेन म्यूजिक कंपोजर्स में गिने जाते हैं। 12 मार्च 1995 को चेन्नई में रहमान का सायरा बानो से शादी की उनकी दो बेटीयाँ, ख़दीजा, रहीमा और एक बेटा अमीन हैं। हालाँकि उनकी तलाक़ की खबरें भी हैं। बहरहाल रहमान साहब ने ‘तहज़ीब’, ‘बॉम्बे’, ‘दिल से’, ‘रंगीला’, ‘ताल’, ‘जीन्स’, ‘पुकार’, ‘फिज़ा’, ‘लगान’, ‘मंगल पांडे’, ‘स्वदेस ‘, ‘रंग दे बसंती’, ‘जोधा-अकबर’, ‘जाने तू या जाने ना’, ‘युवराज’, ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’, ‘गजनी’ जैसी फिल्मों में संगीत दिया है। कई विज्ञापनों के जिंगल भी लिखे और उनका संगीत तैयार किया।

अभिनय में भी हाँथ आज़माने को हैं तैयार :-

रिपोर्टों की मानें तो कॉमेडी फिल्म ‘मूनवॉक’ के ज़रिये ऑस्कर विजेता ए.आर. रहमान अब बड़े पर्दे पर डेब्यू कर एक नई पहचान बनाने के लिए तैयार हैं। इस फिल्म में उनके साथ लीड रोल में होंगे मशहूर डांसर-एक्टर प्रभु देवा।
इस फ़िल्म में वो खुद थोड़े गुस्सैल फिल्म डायरेक्टर का किरदार निभा रहे हैं। हालाँकि ये उनका पहला मौका नहीं है , इससे पहले भी वो कई फिल्मों में कैमियो कर चुके हैं।क फिल्म के गीत ‘मायिले’ को लेकर वो पहले से ही चर्चा में है। 


 

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