History Of Rewa Ghat: बनारस का रीवा घाट जिसका संबंध विंध्य की धरती और रीवा राज्य के इतिहास से जुड़ा हुआ है। रीवा रियासत के शासकों द्वारा निर्मित एवं संरक्षित होने के कारण यह घाट रीवा घाट के नाम से जाना जाता है। साथ ही इसका संबंध पंजाब के महाराज रणजीत सिंह से भी था।
बनारस का रीवा घाट
अब ज़रा कल्पना कीजिए आप बनारस की यात्रा पर हैं। काशी विश्वनाथ के दर्शन कर गंगा तट की ओर बढ़ते हैं। तभी आपकी दृष्टि एक शांत, भव्य कोठी और सौम्य घाट पर ठहर जाती है, जिस पर लिखा है “रीवा घाट”, जहाँ कुछ युवा बैठे हैं या कोई सांस्कृतिक विमर्श चल रहा है। यदि आप रीवा या विंध्यक्षेत्र से हैं, तो यह नाम आपको भीतर तक छू जाएगा और आप ठहरकर, कुछ क्षणों के लिए ही सही, यह सोचने लगेंगे।
कहाँ स्थित है रीवा घाट
रीवा घाट बनारस के सबसे सुंदर, शांत और ऐतिहासिक घाटों में से एक है। यह अस्सी घाट और तुलसी घाट के एकदम मध्य स्थित है। यह घाट अपने ऐतिहासिक वैभव, सांस्कृतिक गरिमा और आध्यात्मिक वातावरण के लिए प्रसिद्ध है। ऐतिहासिक दृष्टि से रीवा घाट कभी अस्सी घाट का ही एक हिस्सा हुआ करता था। समय के साथ अस्सी घाट के विस्तार और पुनर्निर्माण के कारण इससे अलग-अलग घाटों का निर्माण हुआ, जिनमें अस्सी घाट, गंगा महल घाट, रीवा घाट और तुलसी घाट प्रमुख हैं। सदियों की विकासयात्रा में इन घाटों ने आज अपनी-अपनी अलग पहचान स्थापित कर ली।
क्या है रीवा घाट का इतिहास | History Of Rewa Ghat
रीवा घाट का प्रारंभिक इतिहास पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह और उनके पुरोहित लाला मिसिर से जुड़ा है। उन्होंने ही सर्वप्रथम यहाँ घाट का निर्माण कराया और साथ ही एक महल भी बनवाया था। इसी कारण यह स्थान लंबे समय तक लाला मिसिर घाट के नाम से जाना जाता था। इसके बाद इसे कुछ समय तक लीलाराम घाट के नाम से भी जाना गया। कालांतर में सन 1879 ईस्वी में इस महल को रीवा रियासत के महाराज रघुराज सिंह ने खरीद लिया। इसके पश्चात रीवा राज्य द्वारा घाट का व्यापक सौंदर्यीकरण कराया गया और इसे और अधिक भव्य स्वरूप प्रदान किया गया। साथ ही इसमें रीवा रियासत का राजचिन्ह भी अंकित करवाया गया। तब से यह कोठी रीवा महल या रीवा कोठी के नाम से जानी जाने लगी और इसी कोठी के कारण यह घाट रीवा घाट के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
रीवा कोठी का स्थापत्य
वैसे तो चार मंज़िला यह कोठी अत्यंत ही खूबसूरत है, पर विशेष रूप से इसका गंगा तट से सटा हुआ भाग और भी अधिक आकर्षक है। इसका निर्माण चुनार के पत्थरों से निर्मित स्तंभों को कुशलतापूर्वक जोड़कर किया गया है, जो ऊपर बने भव्य महल को मजबूत आधार प्रदान करते हैं। कोठी के निर्माण के समय इस बात का भी ध्यान रखा गया था कि गंगा की तेज धाराओं और प्रचंड बाढ़ में भी यह सुरक्षित रहे। इसी उद्देश्य से घाट की ओर, जहाँ जलधारा का प्रवाह तीव्र होता है, वहाँ चुनार पत्थर की बड़ी-बड़ी सिल्लियों को जोड़ते हुए इसे एक मंज़िला ऊँचा निर्मित किया गया है।
रीवा कोठी बना बीएचयू छात्रावास
लेकिन कालांतर में वर्ष 1955 में रीवा महाराज द्वारा इस रीवा कोठी को बीएचयू अर्थात बनारस हिंदू विश्वविद्यालय को दान कर दिया गया। वर्तमान में यह कोठी विश्वविद्यालय के अंतर्गत आती है और इसका उपयोग थिएटर एवं संगीत कला के विद्यार्थियों के छात्रावास के रूप में किया जाता है। इस प्रकार रीवा घाट केवल एक धार्मिक या ऐतिहासिक स्थल ही नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक केंद्र के रूप में भी विकसित हुआ है।
आध्यात्मिक शांति देने वाला घाट
दरअसल रीवा घाट, अस्सी घाट के ठीक बगल में स्थित है। इसी कारण अस्सी घाट की भीड़-भाड़ से दूर शांति और एकांत की तलाश करने वाले लोग प्रायः यहाँ आकर कुछ समय बिताना पसंद करते हैं। प्रातःकाल जब सूर्य की पहली किरणें माँ गंगा के जल पर पड़ती हैं, तब रीवा घाट पर एक अद्भुत आध्यात्मिक शांति का अनुभव होता है।
कला छात्रों की भी लगती है जमघट
अन्य घाटों की तुलना में यह घाट अपेक्षाकृत शांत रहता है। यहाँ से दिखाई देने वाला गंगा का सूर्योदय अत्यंत मनोहारी होता है। सुबह के समय साधक और पर्यटक योग एवं ध्यान में लीन दिखाई देते हैं। वहीं संध्या के समय रीवा कोठी के परिसर में देश-विदेश से आए संगीत और थिएटर के विद्यार्थियों की रियाज़ और जुगलबंदी सुनने को मिलती है, जो पूरे वातावरण को और भी सौंदर्यपूर्ण तथा जीवंत बना देती है। रीवा घाट बनारस की उस सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपरा का प्रतीक है, जहाँ इतिहास, अध्यात्म और कला तीनों का सुंदर संगम देखने को मिलता है। शांत वातावरण, भव्य अतीत और जीवंत वर्तमान इसे काशी के विशिष्ट घाटों में एक अलग पहचान प्रदान करते हैं।
