गणतंत्र का अर्थ है जनता का शासन, यह संस्कृत के दो शब्दों गण और तंत्र के मेल से बना है, गण का अर्थ होता है जनता और तंत्र का मतलब होता है, शासन और प्रशासन। अर्थात जो शासन जनता या उनके चुने गए प्रतिनिधियों के माध्यम से चले वही गणतंत्र है। गणतंत्र को हम और आसान भाषा में समझें तो उसे लोकतंत्र कह सकते हैं, अर्थात लोगों का शासन।
आधुनिक विश्व में सबसे पहले लोकतंत्र फ्रांस और अमेरिका में आया। भारत में भी आज़ादी के बाद 26 जनवरी 1950 में संविधान लागू हुआ और हम गणतांत्रिक देश बने। उससे पहले देश में अंग्रेजों का निरंकुश शासन और हजारों वर्षों से सतत चलने वाली राजशाही थी। हालांकि भारत में राजशाही तो थी, लेकिन इतिहास में अगर हम देखे तो प्राचीन समय में यहाँ कई गणसंघ भी थे, हालांकि इन गणसंघों की तुलना आज से नहीं की जा सकती, लेकिन फिर भी एक सूत्र तो हम प्राप्त कर ही सकते हैं। इन गणसंघों में सबसे प्रमुख था वज्जि या वृज्जि संघ जिसकी राजधानी वैशाली थी, यह भारत के प्रमुख 16 महाजनपदों में से एक था। वज्जि संघ में कई राजकुल शामिल थे, जिनमें से में लिच्छवि सबसे प्रमुख थे। इसके अलावा और भी कई गणसंघ रहे हैं, जिनका जिक्र इतिहास में मिलता है।
15 अगस्त 1947 में अंग्रेजों से मिली आज़ादी के बाद ही देश को चलाने का एक विधान को बनाया गया था, लेकिन उसको बनाने की प्रक्रिया पहले ही प्रारंभ हो गई थी। 16 मई 1946: कैबिनेट मिशन ने संविधान सभा की संरचना और स्वरूप निर्धारित करने की योजना बनाई। जुलाई 1946 में संविधान सभा के लिए चुनाव संपन्न हुए, अविभाजित ब्रिटिश भारत से 296 सदस्य और 20 स्वतंत्र भारतीय राज्यों से 93 सदस्य चुने गए। 11 जुलाई 1946 को बी एन राव को संविधान सभा का सलाहकार नियुक्त किया गया, 9 दिसंबर 1946 संविधान सभा का गठन हुआ और सच्चिदानंद सिन्हा को संविधान का कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया। अलग देश की मांग करते हुए मुस्लिम लीग ने बैठक का बहिष्कार किया। 11 दिसंबर 1946 को डॉ राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष नियुक्त किए गए। हरेंद्र कुमार मुखर्जी उपाध्यक्ष और बी. एन. राव संवैधानिक कानूनी सलाहकार नियुक्त किए गए। शुरू में संविधान सभा में कुल 389 सदस्य थे, जो विभाजन के बाद घटकर 299 रह गए। 389 में से 292 सरकारी प्रांतों से, 4 मुख्य आयुक्त शासित प्रांतों से और 93 रियासतों से थे। 13 दिसंबर 1946 जवाहरलाल नेहरू द्वारा एक ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ प्रस्तुत किया गया, जिसमें संविधान के अंतर्निहित सिद्धांतों को निर्धारित किया गया, जो बाद में संविधान की प्रस्तावना बन गया। 23 जनवरी को उद्देश्य प्रस्ताव को सर्वसम्मति से अपनाया गया। 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रीय ध्वज को अपनाया गया।
15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हुआ और दो हिस्सों डोमिनियन ऑफ़ इंडिया और डोमिनियन ऑफ़ पाकिस्तान में विभाजित हो गया। 29 अगस्त 1947 को प्रारूप समित का निर्माण हुआ जिसके अध्यक्ष डॉ बी. आर. अम्बेडकर को बनाया गया। इस समिति के अन्य सदस्य के.एम. मुंशी, मुहम्मद सादुला, अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर, गोपाल स्वामी अयंगर, एन. माधव राव और टी.टी. कृष्णमाचारी थे। इस समिति में पहले बी.एल. मित्रा और डी. पी. खेतान भी थे। लेकिन मित्रा ने अस्वस्थता के कारण इस्तीफा दे दिया था और डी.पी. खेतान की 1948 में मृत्यु हो गई थी। 16 जुलाई 1948 में टी.टी. कृष्णमाचारी को इस सभा का दूसरा अध्यक्ष नियुक्त किया गया। 26 नवम्बर 1949 को संविधानसभा ने सर्वसम्मति से संविधान को पारित किया। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा की आखिरी बैठक हुई और हस्ताक्षर कर सभी ने इसे सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया। भारत के संविधान में कुल 395 अनुच्छेद, 8 अनुसूचि और 22 भाग थे। संविधान को बनने में 2 साल, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा। ‘भारत का संविधान’ को पूरा करने में कुल ₹6.4 मिलियन का खर्च आया। गणतंत्र बनने के बाद डॉ राजेंद्र प्रसाद पहले राष्ट्रपति बनाए गए और गणेश वासुदेव मावलंकर लोकसभा की बैठक में पहले अध्यक्ष बने। इसके बाद 1952 में पहली बार देश में मतदान हुए।
भारत की संविधान सभा ने वैसे तो अपना कार्य 9 दिसंबर 1946 से ही प्रारंभ कर दिया था, और 26 नवंबर 1949 को संविधान बन कर पूर्ण हो गया था, प्रारूप समिति ने इसी दिन संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेंद्र प्रसाद को संविधान का ड्राफ्ट भी सौंप दिया था। लेकिन संविधान को लागू किया गया, 26 जनवरी 1950 को, 26 जनवरी का दिन चुनने का भी एक प्रमुख कारण था, दरसल 26 जनवरी 1929 को हुए कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पंडित जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में पहली बार पूर्ण स्वराज की मांग की गई थी, उसके बाद भी जब तक देश आज़ाद नहीं हुआ था, तब तक इसी दिन स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता था, इसीलिए संविधान को लागू करने के लिए भी यही दिन चुना गया।
देश में संविधान लागू होने के बाद, अब तक में 106 बार संविधान संशोधन किया जा चुका है। पहला संविधान संशोधन 18 जून 1951 को किया गया और अब तक का आखिरी संशोधन 28 सितम्बर 2023 को किया गया। सबसे महत्वपूर्ण संशोधन 42वां संशोधन था, जिसे 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा किया गया था। इसे सबसे महत्वपूर्ण संशोधन था, इसीलिए इसे लघु संविधान के रूप में भी जाना जाता है, इसके माध्यम से स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों को प्रभावी बनाया गया था। संविधान की प्रस्तावना में समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और अखंडता तीन नए शब्दों को जोड़ा गया। इसी संविधान संशोधन द्वारा नागरिकों के लिए मौलिक कर्तव्यों को जोड़ा गया, कैबिनेट की सलाह मानने के लिए राष्ट्रपति को बाध्य कर दिया गया। 1971 की जनगणना के आधार पर 2001 तक सभी लोकसभा और राज्य विधानसभा की सीटों को निश्चित कर दिया गया। किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन की एक बार की अवधि को 6 माह से बढ़ाकर एक वर्ष कर दिया गया। किसी भी राज्य में कानून और व्यवस्था की गंभीर स्थिति से से निपटने के लिए केंद्र को सशस्त्र बलों को भेजने की शक्ति दी गई और सर्वप्रमुख संवैधानिक संशोधन को न्यायिक जाँच से बाहर कर दिया गया।