History Of Chhuhiya Ghati: हाल ही में खबर आई कि रीवा सीधी मोहनिया टनल के तर्ज पर ही रीवा-अमरकंटक रोड पर स्थित छुहिया घाटी में भी टनल का निर्माण करवाया जाएगा, इसके लिए शासन स्तर पर प्रारंभिक डीपीआर इत्यादि के कार्य शुरू भी हो गए हैं। छुहिया घाटी जो रीवा-अमरकंटक मार्ग में पड़ती है, टनल बनने के बाद मार्ग और उसमें आवागमन सुविधाजनक हो जाएगा। आप सभी लोग भी कभी ना कभी इस कठिन मार्ग से गुजरते हुए और विशाल पर्वतमाला को देखकर कभी ना कभी आपको भी विचार आता ही होगा या आया होगा, आखिर यहाँ पर इस ऊंची पहाड़ी में सड़क का निर्माण कब, किसने और क्यों करवाया होगा, आखिर इस मार्ग का इतिहास क्या है आइए जानते हैं इस वीडिओ में।
अतीत में यह घाटी कभी अपने छुही खदानों के कारण प्रसिद्ध थी, कहते हैं दूर-दराज के लोग छुही की तलाश में यहाँ आते थे और छुही ले जाते थे, चूंकि पहले के कच्चे घरों की लिपाई-पुताई के लिए छुही जरूरी होती थी, तो छुही की जरूरत ने ही यहाँ रास्ते की नींव डाली। धीरे-धीरे पहाड़ के उस तरफ के लोग रीवा-गोविंदगढ़ साइड आने के लिए इसी पहाड़ी, दुर्गम ऊबड़-खाबड़ मार्ग का प्रयोग करने लगे, समय व्यतीत होता गया। एक बार तत्कालीन रीवा नरेश महाराज व्यंकट रमण सिंह जूदेव ने यहाँ शिकार के वास्ते हाका डाला था, ऊंची चोटी पर पहुँच कर जब उन्होंने यहाँ से देखा तो उन्हें रीवा और सीधी दोनों क्षेत्र के विहंगम दृश्य बराबर दिख रहे थे, यहाँ अगल-बगल उपत्यकाएं और नीचे का जंगली क्षेत्र और उसके नजारे उनका मन मोह रहे थे, इसीलिए उन्होंने इन दोनों क्षेत्रों को एक-दूसरे से प्रत्यक्ष जोड़ने की परिकल्पना की।
छुहिया घाटी सड़क का इतिहास | History of Chhuhiya Ghati
इसी उद्देश्य हेतु उन्होंने यहाँ के प्रचलित ऊबड़-खाबड़, पथरीले और दुष्कर मार्ग को को समतल और व्यवस्थित कराने का विचार किया, उन्होंने सोचा इससे न केवल यात्रियों की कठिनाई कम होगी, बल्कि राज्य के सुदूर क्षेत्रों से संपर्क भी सुलभ हो सकेगा। क्योंकि उस समय का मार्ग अत्यंत कठिन था। यात्रा में अत्यधिक समय, श्रम और संसाधन लगते थे। बरसात के दिनों में तो यह रास्ता लगभग दुष्कर ही हो जाता था। इसी दूरदर्शी सोच के साथ सन् 1918 में उन्होंने छुहिया घाटी के प्रचलित पहाड़ी मार्ग को कटवाकर और सपाट करवाकर एक सुव्यवस्थित सड़क का निर्माण कराया। यह मार्ग आगे चलकर विंध्य क्षेत्र के दक्षिण-पूर्वी अंचलों से संपर्क का प्रमुख साधन बना। विशेषतः सुदूर अमरकंटक और वर्तमान सीधी-सिंगरौली जिले की ओर राजधानी रीवा से जाने वाला मार्ग अत्यंत सुगम हो गया। कालांतर में आगे चलकर मध्यप्रदेश सरकार ने इसका चौड़ीकरण करवा के इसे और सुगम बनाया।
शिकारगाह कोठी का भी निर्माण करवाया गया
इसके साथ ही महाराज व्यंकट रमण सिंह जी ने, अपने शिकार और राजसी मनोरंजन के लिए पहाड़ी की सर्वोच्च चोटी पर एक भव्य कोठी की परिकल्पना की थी। इसी उद्देश्य हेतु यहाँ शिकारगाह कोठी का निर्माण कराया गया। यह कोठी तराशे हुए विशाल पत्थरों से अत्यंत सुदृढ़ और सुसंगठित रूप के साथ निर्मित है, जो उस समय की खूबसूरत स्थापत्य कला का स्पष्ट प्रमाण है। लगभग 75 × 50 वर्गफुट के क्षेत्रफल में विस्तृत यह भवन आकार में भले ही ज्यादा न हो। किंतु अपनी मजबूती, ऊँचाई और खूबसूरत विहंगम पहाड़ी दृश्यों के कारण अपनी भव्य राजसिकता का आभास कराती है। हालांकि यह दुर्भाग्यपूर्ण ही था, कि इस घाट में आवागमन की सुगमता के लिए सड़क और शिकारगाह की कोठी का निर्माण करवाने वाले महाराज व्यंकट रमण सिंह जूदेव स्वयं इन सफल निर्माणों को देखने के लिए जीवित ना रहे और ठीक उसी वर्ष 1918 में इंफ्लुएंजा के कारण उनका महज 38 वर्ष में दुखद निधन हो गया।
आधुनिक रीवा के निर्माता थे महाराज व्यंकट रमण सिंह जूदेव
दरसल महाराज व्यंकट रमण सिंह बहुत ही न्यायप्रिय और प्रजावत्सल नरेश थे, इतिहास में उन्हें आधुनिक रीवा की नींव रखने वाले शासक के तौर पर जाना जाता है। उन्होंने अपने राज्य और प्रजा के हित के लिए जो अथक प्रयास किए यह उनकी दूरदर्शिता और कुशल प्रशासनिक दक्षता का प्रमाण है। इस सड़क के निर्माण ने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया, हालांकि यह बात और है कि हमारे विंध्यक्षेत्र के अधिकतर लोग ही यह बात नहीं जानते हैं। इसीलिए हमने सोचा अपने विंध्य के इतिहास की जानकारी आप सब तक पहुंचाई जाए, तो यह वीडिओ अगर पसंद आया हो तो लाइक और शेयर जरूर कीजिए, वीडिओ पर आपकी क्या राय है वह भी कमेंट्स सेक्शन में हमें जरूर बताएं और अगर आपने अभी तक हमें फॉलो नहीं किया है तो कृपया बेल आइकॉन दबाकर हमें फॉलो करें, एवं रीवा और विंध्य के इतिहास और संस्कृति पर ऐसे ही नई जानकारी वाले वीडिओ देखने के लिए जुड़े रहें शब्द सांची विंध्य से।

