दिल्ली में बढ़ते Heavy Metal Pollution को लेकर एक नई रिसर्च ने चिंता बढ़ा दी है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) से जुड़े रिसर्च करने वाले लोगों के अध्ययन के अनुसार शरीर में भारी धातु ऑन का बढ़ता लेवल उम्र वाले लोगों के लिए याददाश्त का खतरा हो सकता है। हालांकि रिसचर्स ने से शुरुआती निष्कर्ष बताते हुए और बड़े अध्ययन की जरूरत पर जोर बताया है।
एम्स की स्टडी में क्या सामने आया?
All India Institute of Medical Sciences, New Delhi के बायोफिजिक्स विभाग द्वारा किए गए रिसर्च के अध्ययन में 60 साल से अधिक उम्र के लोगों के ब्लड सैंपल की जांच की गई जिसमें पाया गया कि जिन बुजुर्गों को भूलने या याद रखने में दिक्कत होती थी उनके खून में कुछ भारी धातुओं का लेवल सामान्य से ज्यादा पाया गया है। इनमें एल्युमिनियम, मैंगनीज, निकल, कोबाल्ट और जिंक जैसे धातुएं मिली है। रिसर्च करने वाले लोगों का कहना है कि यह सभी मेटल लंबे समय तक शरीर में जमा होकर तंत्रिका तंत्र को प्रभावित कर सकती हैं।
ये भी पढ़े : Lemon Clove Tea रोज पीने से क्या होते हैं फायदे? हेल्थ कोच ने बताई सच्चाई
Heavy Metal Pollution शरीर में कैसे पहुंचता है?
रिसर्च करने वाले लोगों के अनुसार भारी धातुएं हवा, पानी और खाद्य पदार्थ के जरिए हमारे शरीर में प्रवेश करती है। औद्योगिक प्रदूषण, ट्रैफिक से निकलने वाला धुआं और गंदे जल आदि जैसे स्रोत इसके प्रमुख कारण बताए जाते हैं। जब यह सभी तत्व लगातार हमारे शरीर में जमा होते हैं तो वह मस्तिष्क की कोशिकाओं पर सीधे असर डाल सकते हैं हालांकि यह अभी पूरी तरह से सिद्ध नहीं हो पाया है कि यही अल्जाइमर का सीधा कारण है या नहीं।
क्या याददाश्त की समस्या का बढ़ सकता है जोखिम?
रिसर्च करने के दौरान या संकेत मिला है कि जिन भी लोगों में भारी धातुओं का लेवल अधिक पाया गया है उनमें सोचने और समझने की शक्ति और याद रखने की क्षमता कमजोर होती है। विशेषज्ञ उन्हें स्पष्ट रूप से बताया है कि यह एक प्रकार का संबंध है ना कि कोई प्रत्यक्ष कारण। यानी यह नहीं कहा जा सकता कि केवल हेवी मेटल के पॉल्यूशन से ही भूलने की बीमारी का कारण हुआ है लेकिन जोखिम इससे बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों की क्या है राय?
एम से जुड़े सभी वैज्ञानिक का ऐसा कहना है कि यह अध्ययन सीमित समूह पर ही आधारित है इसका कोई बड़ा निष्कर्ष निकालने के लिए इसका बड़े पैमाने पर रिसर्च करना जरूरी है। पर्यावरण स्वास्थ्य के विशेषज्ञ का समान है कि प्रदूषण कम करने के प्रयास और नियमित रूप से हेल्थ जांच से इसके रिक्स को कम किया जा सकता है। बुजुर्गों की आदत से जुड़ी शिकायत होने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी होता है।
ये भी पढ़े : Blood sugar test
क्या आने वाले समय में विस्तृत अध्ययन होगा?
रिसर्च करने वाले लोगों ने ऐसा संकेत दिया है कि आने वाले समय में इस विषय पर एक बड़ा अध्ययन हो सकता है ताकि यह समझा जाए की हैवी मेटल पॉल्यूशन और दिमाग की सभी बीमारियों के बीच में कितना गहरा संबंध हो सकता है फिलहाल यह रिपोर्ट पर्यावरण प्रदूषण और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संभावित संबंध को लेकर एक चेतावनीहै।

