Harvest Festival of India : मकरसंक्रांति व पोंगल-सूर्य के स्वागत और धरती के आभार का उत्सव

Harvest Festival of India : मकरसंक्रांति व पोंगल-सूर्य के स्वागत और धरती के आभार का उत्सव-भारत की सांस्कृतिक विरासत में त्योहार केवल उल्लास नहीं, बल्कि प्रकृति, ऋतुचक्र और जीवन के साथ सामंजस्य का प्रतीक हैं। मकर संक्रांति और पोंगल ऐसे ही दो पर्व हैं, जो सूर्य की किरणों के उत्तरायण होने और नई फसल के आगमन की खुशी में मनाए जाते हैं। ये उत्सव भौगोलिक दूरियों के बावजूद भारत की अंतर्निहित एकता, कृषि-आधारित सभ्यता और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता के सूत्र में बंधे हैं। मकर संक्रांति और पोंगल दोनों ही सूर्य उपासना और नई फसल के स्वागत के पर्व हैं। जानिए इनका धार्मिक महत्व, अनुष्ठान, समानताएं और अंतर सहित मकर संक्रांति और पोंगल भारत के प्रमुख फसल व सूर्य उपासना पर्व हैं। जानिए इनका धार्मिक महत्व, पारंपरिक अनुष्ठान, खास व्यंजन और इनमें क्या समानता व अंतर है। हिंदी में पूरी जानकारी।

मकर संक्रांति उत्तरायण का शुभागमन

उत्तर भारत में मनाया जाने वाला मकर संक्रांति का पर्व खगोलीय घटना से जुड़ा है, जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर बढ़ना शुरू करता है। हिंदू धर्मशास्त्रों में इस अवधि को अत्यंत पवित्र माना गया है, जिसे देवताओं का दिन कहा जाता है।

पर्व का अर्थ और सामाजिक-धार्मिक महत्व

यह पर्व केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत भर नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि और नवचेतना का प्रतीक है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन किए गए स्नान, दान और पूजा-अर्चना से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। यह समाज में सेवा और सहयोग की भावना को भी मजबूत करता है, क्योंकि इसमें जरूरतमंदों को दान देना एक प्रमुख अनुष्ठान है।

मुख्य रीति-रिवाज और परंपराएं

पवित्र स्नान-गंगा, यमुना, गोदावरी जैसी नदियों में स्नान को मोक्ष प्राप्ति का साधन माना जाता है। प्रयागराज और हरिद्वार में विशाल मेले लगते हैं।

तिल-गुड़ का महत्व-तिल और गुड़ से बने व्यंजन खाने और दान देने की परंपरा है। तिल का ताप देने वाला और गुड़ का मिठास भरा गुण शीत ऋतु में स्वास्थ्य के लिए लाभदायक माना जाता है।

पारंपरिक व्यंजन-खिचड़ी, तिल के लड्डू, गजक, रेवड़ी जैसे व्यंजन इस पर्व की पहचान हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में इसे ‘खिचड़ी पर्व’ के नाम से भी जाना जाता है।

पतंगबाजी-गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में पतंग उड़ाना उत्सव का एक रंगारंग हिस्सा है, जो स्वतंत्रता और आनंद का प्रतीक है।

क्षेत्रीय विविधता में एकता

इस पर्व को भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों और शैलियों में मनाया जाता है-

लोहड़ी (पंजाब)-लोहड़ी वाले दिन अग्नि के चारों ओर नृत्य, गिद्दा और भांगड़ा, तिल और मूंगफली,रेवड़ी आदि का का प्रसाद बाँटने की परम्परा है ।

बिहू (असम)-इस दिन नई फसल का स्वागत किया जाता है जिसमे पारंपरिक नृत्य और स्वादिष्ट भोजन बना कर वितरित करने और रात्रि में सामूहिक रूप से एकत्र होकर उत्सव में नृत्य आदि के आयोजन की परम्परा है।

उत्तरायण (गुजरात)- उत्तर भारत में भी इस दिन नई फसलों जैसे चावल – दाल और सब्जियों की खिचड़ी बनाकर परिवार सहित कहते हैं जबकि मूंगफली-गूढ़ की पट्टीतीली के लड्डू का भी भोग भागवान को लगाते हैं यहाँ भी इस दिन पतंगबाजी का बड़ा उत्सव मनाया जाता है।

पोंगल-तमिलनाडु का चार दिवसीय फसल उत्सव-दक्षिण भारत के तमिलनाडु में मनाया जाने वाला पोंगल त्योहार कृषि और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का भाव लिए होता है। यह चार दिनों तक चलने वाला एक समृद्ध और विस्तृत उत्सव है।

अर्थ और दार्शनिक पहलू

“पोंगल” शब्द का तमिल में अर्थ है “उफान” या “उबाल”। यह न केवल दूध-चावल के व्यंजन के उफान को दर्शाता है, बल्कि जीवन में समृद्धि, उन्नति और खुशहाली के “उफान” का भी प्रतीक है। यह त्योहार सूर्य देव, धरती माता, मवेशियों और किसानों के श्रम के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर है।

चार दिवसीय उत्सव की रूपरेखा

भोगी पोंगल-पहले दिन घरों की सफाई की जाती है और पुरानी, अनुपयोगी वस्तुओं को अग्नि में जलाया जाता है। यह पुराने को त्यागकर नई शुरुआत का प्रतीक है। संध्या में अग्नि के चारों ओर परिवार इकट्ठा होता है।

सूर्य पोंगल-दूसरे दिन को विशेष मानते हैं नए बर्तनों में चावल, दूध और गुड़ से विशेष “पोंगल” व्यंजन बनाया जाता है। इसे उबलने दिया जाता है और उफनते हुए सूर्य देव को अर्पित किया जाता है। “पोंगो पोंगल!” का उद्घोष किया जाता है। घर के आंगन में रंगोली बनाई जाती है।

मट्टू पोंगल-तीसरे दिन कृषि कार्य में सहायक गाय और बैलों का सम्मान किया जाता है। उन्हें नहलाकर, सजाकर, उनके सींगों को रंगकर और विशेष भोजन देकर पूजा जाता है। यह पशुधन के प्रति सम्मान का दिन है।

कानू पोंगल-और चौथे दिन-पारिवारिक मिलन के लिए समर्पित होता है। बहनें अपने भाइयों की खुशहाली के लिए प्रार्थना करती हैं। परिवार के सदस्य पिकनिक पर जाते हैं और सामूहिक भोज का आयोजन करते हैं।

समानताएं एक ही भाव के दो रंग

मकर संक्रांति और पोंगल दोनों ही त्योहार मूल रूप से निम्नलिखित साझा भावों से जुड़े हैं जैसे-दोनों सूर्य देव की कृपा और उनके उत्तरायण होने की खुशी में मनाए जाते हैं। फसल उत्सवदोनों नई फसल के आगमन और प्रकृति की उदारता के प्रति आभार प्रकट करने का माध्यम हैं। दोनों परिवार और समुदाय को एक साथ लाते हैं, साझा भोज और उत्सव का माहौल बनाते हैं। ये ऋतु परिवर्तन के साथ नई शुरुआत, आशा और समृद्धि की कामना से जुड़े हैं।

    अंतर-परंपरा और अभिव्यक्ति की विविधता

    पहलू मकर संक्रांति पोंगल- विशेष यह की उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत मुख्यतः तमिलनाडु (दक्षिण भारत) में या त्योहार मनाया जाता है जिसकी अवधि प्रायः एक दिवसीय (कुछ क्षेत्रों में 2-3 दिन) स्पष्ट रूप से परिभाषित चार दिवसीय उत्सव होता है। जबकि केंद्र बिंदु स्नान, दान-पुण्य, तिल-गुड़ का प्रसाद फसल, सूर्य व मवेशी पूजा, पोंगल पकवान और प्रमुख प्रतीक पतंग, तिल के लड्डू, खिचड़ी पोंगल बर्तन, रंगोली, सजे हुए बैल स्वरूप धार्मिक अनुष्ठान और दान पर बल कृषि और पारिवारिक अनुष्ठानों का विस्तृत क्रमशः सभी जगह एक सा ही उद्देश्य होता है।

    निष्कर्ष-संस्कृति के सूत्र में बंधा भारत-मकर संक्रांति और पोंगल का सार यह है कि ये हमें प्रकृति के चक्र के साथ तालमेल बिठाकर जीने, कृतज्ञता का भाव रखने और सामूहिक खुशियां मनाने की प्रेरणा देते हैं। ये त्योहार भारत की उस सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाते हैं, जहां अलग-अलग रीति-रिवाज एक ही मूलभूत सत्य-सूर्य के प्रकाश, धरती की उर्वरा शक्ति और मानव श्रम के महत्व-को स्वीकार करते हैं। आज के दौर में, जब प्रकृति से हमारा रिश्ता कमजोर हो रहा है, ये पर्व हमें याद दिलाते हैं कि सच्ची समृद्धि भौतिक संपदा से नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सद्भाव, समाज में सहयोग और जीवन में सादगी व संतोष से आती है। यही कारण है कि सदियां बीत जाने के बाद भी, ये उत्सव भारतीय जीवन की धड़कन और हमारी सांस्कृतिक पहचान का अटूट हिस्सा बने हुए हैं।

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