Guru Gobind Singh Jayanti : साहस-समानता व धर्मरक्षा का प्रतीक है-गुरु गोबिंद सिंह जयंती सिख धर्म के दसवें और अंतिम मानव गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के जन्मोत्सव के रूप में पूरे श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जाती है। वे केवल एक आध्यात्मिक गुरु ही नहीं, बल्कि एक महान योद्धा, कवि, दार्शनिक और समाज-सुधारक भी थे। यह पावन पर्व हर वर्ष नानकशाही कैलेंडर के अनुसार दिसंबर या जनवरी माह में आता है। इस अवसर पर खालसा पंथ की स्थापना, निर्भीकता, समानता, न्याय और निःस्वार्थ सेवा के उनके अमूल्य संदेशों को स्मरण किया जाता है। देश-विदेश के गुरुद्वारों में कीर्तन, कथा, प्रभात फेरियाँ और लंगर का आयोजन होता है। गुरु गोबिंद सिंह जयंती सिखों के दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी के जन्मोत्सव का पावन पर्व है। जानिए उनका जीवन, खालसा पंथ की स्थापना, शिक्षाएँ, योगदान और जयंती का महत्व।
गुरु गोबिंद सिंह जी का जीवन परिचय
जन्म- 22 दिसंबर 1666, पटना साहिब (बिहार)
मूल नाम-गोबिंद राय
पिता-नौवें सिख गुरु, गुरु तेग बहादुर जी
माता-मां गुजरी देवी जी-बाल्यावस्था से ही उनमें अद्भुत साहस, बुद्धिमत्ता और नेतृत्व क्षमता दिखाई देती थी।
गुरुगद्दी और बलिदान की परंपरा
गुरु तेग बहादुर जी के सर्वोच्च बलिदान के बाद, मात्र 9 वर्ष की आयु में गुरु गोबिंद सिंह जी सिखों के दसवें गुरु बने। उन्होंने धर्म, मानवता और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया।

खालसा पंथ की स्थापना (1699)
सिख समुदाय के इतिहास का सबसे क्रांतिकारी अध्याय बैसाखी 1699 को लिखा गया, जब गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की साथ ही उन्होंने सिखों को अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध खड़े होने वाला योद्धा समुदाय होने की बढ़ी और समृद्ध पहचान दी।
पांच ककार-( पांच ‘क’ )
केश – अर्थात बाल
कंघा – यानि बल बनाने वाली कंघी
कड़ा – हाथ में पहनने वाला मोटा चूड़ा
कच्छेरा या कचरेरा – ( पंजाबी-कच्छा ) या कच्चा ( कच्छा ) यानी निचले शरीर के लिए एक अंतर्वस्त्र है जो विशेष रूप से सलवार के लिए सिलवाया जाता है जिसमें पूरी तरह से दीक्षित सिखों द्वारा पहना जाने वाला एक गांठ वाला नाला या नाड़ा होता है।
कृपाण – ये सिखों की पहचान, अनुशासन और आत्मसम्मान के प्रतीक हैं।

साहित्यिक और आध्यात्मिक योगदान
गुरु गोबिंद सिंह जी एक महान कवि और बहु-भाषाओं के विद्वान थे। सिख समुदाय का दसम ग्रंथ उनकी प्रमुख साहित्यिक कृति है और उन्होंने वीर रस, भक्ति और नीति को अपने काव्य में विशेष स्थान दिया है जो वीरता का पर्याय मन जाता है।
गुरु ग्रंथ साहिब को शाश्वत गुरु की घोषणा
1708 ई. में गुरु गोबिंद सिंह जी ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए गुरु ग्रंथ साहिब को सिखों का शाश्वत (अंतिम) गुरु घोषित किया, जिससे गुरु परंपरा को आध्यात्मिक ग्रंथ से जोड़ा गया।
ज्योति में विलय
तिथि – 7 अक्टूबर 1708
स्थान – नांदेड, महाराष्ट्र – विशेष यह की मुगल षड्यंत्र के बाद वे ज्योति में विलीन हो गए, परंतु उनके विचार और आदर्श आज भी जीवित हैं जिन्हें समूची सूखा समाज दृढ़ता से अनुशरण कराती है।
गुरु गोबिंद सिंह जयंती का महत्व और उत्सव
तिथि – पौष मास, शुक्ल पक्ष की सप्तमी
उद्देश्य – साहस, समानता, न्याय और सेवा की प्रेरणा
प्रमुख आयोजन
सिख समाज के प्रमुख आयोजनों में उपरोक्त तिथि पर समूचे शहर में प्रभात फेरियां निकली जाती हैं। इस दिन गुरुद्वारों व घरों में शबद कीर्तन व कथा,अखंड पाठ के आयोजनों में सिख समुदाय स – परिवार शामिल होते हैं। इस दिन लंगर यानी भंडारे का भी आयोजन होता है जिसमें सर्व समाज के लोग ,आमिर – गरीब सब एक पंडाल के नीचे भोजन या प्रसाद ग्रहण करते हैं जो सामाजिक समानता और भाईचारे का प्रतीक है और इस दिन रात्रि जागरण में भजन कीर्तन भी किए जाते हैं।

गुरु गोबिंद सिंह जी की मुख्य शिक्षाएं
एक ओंकार – एक ईश्वर में विश्वास
समानता – जाति, धर्म और लिंग भेद का विरोध
न्याय व साहस – अन्याय के विरुद्ध संघर्ष
सेवा – निःस्वार्थ परोपकार और विनम्रता
निष्कर्ष (Conclusion)-गुरु गोबिंद सिंह जयंती केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानव मूल्यों, आत्मसम्मान और धर्म-रक्षा की जीवंत प्रेरणा है। गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने जीवन से यह सिखाया कि सच्चा धर्म वही है जो अन्याय के विरुद्ध खड़ा हो और मानवता की रक्षा करे। आज के समय में भी उनके विचार हमें साहसी, न्यायप्रिय और करुणामय समाज के निर्माण की दिशा दिखाते हैं।
