Gurh Bhairav Pratima History: मध्यप्रदेश के रीवा जिले में, कलचुरीकाल (10वीं–11वीं शताब्दी) की एक अद्वितीय कालभैरव प्रतिमा विराजमान है। परंपरागत उग्र भैरव स्वरूप से भिन्न, विशाल प्रतिमा असाधारण सौम्यता, शांत मुखमुद्रा और अद्भुत सौंदर्य से युक्त है। सदियों तक एक पहाड़ी नाले में पड़ी रही यह मूर्ति 20वीं शताब्दी में पुनः प्रकाश में आई और आज राज्य संरक्षित स्मारक है।
भगवान शिव के रौद्र अवतार हैं भैरव
भैरव भगवान शिव के अत्यंत उग्र और रौद्र अवतार माने जाते हैं। शिव पुराण के अनुसार उनकी उत्पत्ति भगवान शिव के क्रोध से हुई थी। इसीलिए उन्हें शिव का सबसे भयानक, प्रचंड और विध्वंसक स्वरूप माना गया है, इसी कारण परंपरागत रूप से भैरव की अधिकांश मूर्तियाँ, हाथ में ब्रह्मा का कपाल धारण किए हुए, अपने वाहन के कुत्ते के साथ, विकराल नेत्रों और रौद्र मुख के साथ, अत्यंत उग्र भाव में निर्मित मिलती हैं। पुराणों, तंत्रग्रंथों और शैव परंपरा में भी भैरव का यही स्वरूप प्रमुखता से वर्णित है।
गुढ़ में है सौम्य भैरव की प्रतिमा
लेकिन इस आइकनोग्राफिक परंपरा के विपरीत, मध्यप्रदेश के रीवा जिले में भैरव जी की एक अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट प्रतिमा प्राप्त होती है, जिसमें उनका चित्रण उग्रता के स्थान पर असाधारण सौम्यता के साथ किया गया है, एकदम शांत, कोमल और मनोहर मुखमुद्रा के साथ, जो उन्हें अत्यंत आकर्षक और सौंदर्यपूर्ण स्वरूप प्रदान करती है। यह प्रतिमा न केवल पारंपरिक भैरव प्रतिमाओं से भिन्न है, बल्कि शैव मूर्तिकला की एक अनोखी और विचारोत्तेजक अभिव्यक्ति भी प्रस्तुत करती है।
हजारों सालों तक नाले में पड़ी रही प्रतिमा
10 वीं 11वीं शताब्दी में कलचुरीकाल में निर्मित भैरव जी की यह अनोखी प्रतिमा बिछिया नदी के बाएं तट पर रीवा शहर से करीब 30 किलोमीटर दूर गुढ़ तहसील के खामडीह गाँव में कैमोर पहाड़ियों के मोहनिया घाटी के तलहटी में स्थित है। जो सैकड़ों वर्षों तक यूँ ही एकांत में एक पहाड़ी नाले के भीतर पड़ी रही। समय के साथ उस पर रेत और धूल-मिट्टी की मोटी परतें जमती चली गईं। प्रतिमा के चारों ओर झाड़-झंखाड़ और ऊँचे बांसों का घना जंगल फैल गया था। चरवाहे यहाँ आते और इसी के ऊपर बैठते थे, उनके ही माध्यम से स्थानीय ग्रामीणों को भी धीरे-धीरे इस दुर्लभ प्रतिमा की जानकारी हुई और धीरे-धीरे वह भी यहाँ आने लगे।
मध्यप्रदेश सरकार ने राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया
बीसवीं शताब्दी के साठ और सत्तर के दशक में, जब बिरला समूह को ओरिएंट पेपर मिल के लिए इस क्षेत्र के जंगलों से बांस कटाई का ठेका मिला, तब जंगल की सफाई के दौरान यह विशालकाय काल भैरव प्रतिमा सदियों की शांति और निस्तब्धता के बाद इतिहास के गर्भ से बाहर पुनः प्रकाश में आई। प्रतिमा के यहाँ से प्राप्त होने के कई वर्षों बाद, इसकी सुरक्षा को देखते हुए, कि इसे छति ना पहुंचाई जा सके, मध्यप्रदेश के पुरातत्व विभाग ने प्राचीन स्मारक एवं पुरातत्वीय स्थल तथा अवशेष अधिनियम 1964 के तहत इस मूर्ति को प्रांतीय महत्व का राज्य संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया।
भैरव प्रतिमा की विशेषता
कालभैरव की यह विशाल चतुर्भुजी प्रतिमा एकाश्म है, अर्थात एक ही विशाल पाषाण पर निर्मित है, इसकी ऊंचाई साढ़े आठ मीटर एवं चौड़ाई साढ़े तीन मीटर से भी ज्यादा है। भैरव के हाथों में क्रमशः अक्षमाला, त्रिशूल, नाग और कमंडल है। बायीं ओर के ऊपरी हाथ में तीन फन वाला सर्प एवं नीचे वाले हाथ में कलश, जबकि दाहिनी ओर के ऊपर वाले हाथ में त्रिशूल और नीचे वाले हाथ में अक्षमाला है। गले में रुद्राक्ष और सर्पमाला है एवं कटिभाग अर्थात कमर पर सिंहमुख का घंटी साहित अंकन है। प्रतिमा के दोनों तरफ पैरों के पास अंजलि मुद्रा में दो गण खड़े हैं और दो पारिचारिकाएं बैठे हैं। लगभग 10वीं 11वीं शताब्दी में निर्मित यह भैरव प्रतिमा अपनी विशालता और भव्यता के साथ ही अतीव सौंदर्य से परिपूर्ण है। पुरातत्व और कला दोनों ही दृष्टि से यह प्रतिमा भारत की गिनी चुनी प्रतिमाओं में से एक है और इसे अपने देश की सबसे विशाल और दुर्लभ भैरव प्रतिमा माना जाता है।
बड़े पुरातत्ववेत्ता भी नहीं पहुँच पाए
दरअसल 9वीं से 12वीं शताब्दी के मध्य यह सम्पूर्ण क्षेत्र त्रिपुरी के कलचुरि शासकों के अधीन था। इस वंश के शासक परम शैव थे और उन्होंने अपने राज्य में शैव धर्म, मठों और मंदिर परंपरा को व्यापक संरक्षण प्रदान किया। इस प्रकार अपने उत्कर्ष काल में गुरगी केवल एक व्यापारिक और राजनीतिक ही नहीं बल्कि बल्कि शैव अध्यात्म और धार्मिक गतिविधियों का भी एक प्रमुख केंद्र था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के आरंभिक दौर में विंध्यक्षेत्र की कलात्मक और ऐतिहासिक महत्ता ने विद्वानों का ध्यान अपनी ओर खींचा। जिसके कारण आर्कियोलॉजीकल सर्वे ऑफ इंडिया के संस्थापक सर कनिंघम ने 1883-84 में गुरगी की यात्रा की और अपनी किताब “रिपोर्ट्स ऑफ अ टूर इन बुंदेलखंड एंड रीवा” में यहाँ के स्थापत्य और मूर्तिकला को अत्यंत उच्च कोटि का बताया। बाद के वर्षों में सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद् राखलदास बनर्जी भी 1920 में यहाँ आए थे, जिसका जिक्र उन्होंने अपनी पुस्तक “द हैहय ऑफ त्रिपुरी एण्ड देयर मॉन्यूमेंट्स” में विस्तार से करते हुए गुरगी की प्रशंसा की। पर आश्चर्य की बात यह है कि इन विद्वानों ने गुरगी की मूर्तिकला और स्थापत्य की तो भरपूर सराहना की, लेकिन गुरगी से इतना नजदीक होने के बाद भी इस प्रतिमा तक नहीं पहुँच सके और ना ही इस प्रतिमा का कोई स्पष्ट जिक्र किया है। इसका कारण यही था यह दुर्लभ मूर्ति तब तक प्रकाश में नहीं आ पाई थी।
किसने बनवाई भैरव की यह दुर्लभ प्रतिमा | Gurh Bhairav Pratima History
इन सभी विवरणों के बावजूद एक रहस्यमय प्रश्न आज भी अनुत्तरित है और ज्यादातर लोगों मन में उठता है, गुरगी में प्रतिष्ठित भैरव बाबा की यह प्रतिमा यहाँ कैसे पहुँची? इसका मूल स्थान कहाँ रहा होगा? इसका निर्माण किसने करवाया और कब करवाया। हमने भी यह जानने का प्रयास किया, जिसके लिए किताबें खोजी और पढ़ी लेकिन, लेकिन थोड़े निराश भी हुए, उसके बाद हम रीवा के सुप्रसिद्ध इतिहासकार विजय बहादुर सिंह कर्चुली के पास गए और उनकी मदद से इस प्रतिमा की गुत्थी को सुलझाने का प्रयास किया, उन्होंने हमें बताया कि इस मूर्ति का निर्माण त्रिपुरी के शासक कोकल्लदेव द्वितीय के समय में, उनके राजगुरु विमलशिव के आदेश से करवाया गया था, जिसका जिक्र गुरगी के एक खंडित अभिलेख में हुआ है।
एपीएसयू की टीम ने किया था रिसर्च
उसके बाद हमने थोड़ी और रिसर्च की, तो हमें जर्नल ऑफ हिस्ट्री आर्कियोलॉजी एंड आर्किटेक्चर वॉल्यूम 1, नंबर 1, 2022 की एक रिपोर्ट प्राप्त हुई, जिसके अनुसार इस मूर्ति का निर्माण मेगालीथिक बलुआ पत्थर से हुआ है, जो इस क्षेत्र में बहुतायत से प्राप्त होते हैं। एपीएसयू की शोध टीम ने भैरव बाबा मंदिर के समीप ही एक विशाल बलुआ पत्थर की प्राचीन खदान की पहचान की थी। इस स्थल पर टीम को एक विशाल शिलाखंड भी प्राप्त हुआ था, जिस पर प्राचीन वेज-मार्क्स अर्थात कील-चिह्न स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। दरसल ये वेज-मार्क्स उस युग की पत्थर काटने और शिलाओं को अलग करने की तकनीक का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। शोध टीम को भैरवबाबा स्थान से ही कुछ दूर करीब ढाई किलोमीटर दूर पहाड़ की तरफ इसी तरह के पत्थर से निर्मित एक विशाल गणपति प्रतिमा प्राप्त हुई थी, जो सेम ऐसे ही पत्थर से निर्मित है, हालांकि संसाधन के अभाव में टीम उस मूर्ति की तस्वीर नहीं ले पाई थी।
लाल बलुआ पत्थरों की बहुतायत
हमने जब स्थानीय ग्रामीणों से उस प्रतिमा की जानकारी चाही, तो उन्होंने बताया एक हाथी की प्रतिमा पड़ी हुई, अब शोधकर्ताओं द्वारा बताई गई गणपति प्रतिमा और ग्रामीणों द्वारा बताई गई हाथी प्रतिमा एक ही या अलग-अलग हम नहीं जानते, क्योंकि पहुँच से दूर और मार्ग ना जानने के कारण हम भी उस मूर्ति तक नहीं पहुँच पाए। लेकिन पत्थर की पहचान और इसकी पुष्टि जरूर हो गई, यहाँ निर्माण का काम करवाने वाले एक व्यक्ति ने ऑफ कैमरा हमें बताया कि, मूर्ति का बाईं ओर वाला कुछ हिस्सा खंडित हो गया था, उनकी नाक और ठुड्डी भी भी टूटी हुई थी, जिसके बाद सेम उसी तरह के पत्थर के छोटे-छोटे टुकड़े पहाड़ से लाए गए, और ओड़ीसा के पारंपरिक मूर्तिकला की तकनीकों एवं कुशल कारीगरों की मदद से मूर्ति के आंशिक क्षतिग्रस्त हिस्से को फिर से ठीक किया गया और पॉलिशिंग का का कार्य भी किया गया, जिसके बाद इसे चिकना और गहरा रंग प्राप्त हुआ।
मूर्ति की स्थापना क्यों नहीं की गई
भैरवनाथ की यह कलचुरीकालीन प्रतिमा उस युग की उन्नत मूर्तिकला परंपरा का एक दुर्लभ और अनुपम उदाहरण मानी जा सकती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह प्रतिमा ऐसे ही क्यों पड़ी रही? इसका निर्माण करने के बाद इसे स्थापित क्यों नहीं किया गया? और क्या इस मूर्ति का निर्माण यहाँ स्थित और जमीन से जुड़े किसी महाशिला पर गया है? विद्वानों के अनुसार इस महाशिला को पहाड़ से ही यहाँ तक बरसाती पानी की धार तक किसी तरह लाया गया होगा, इस मूर्ति का निर्माण मूलतः खड़ी मुद्रा में स्थापित करने के उद्देश्य से ही किया गया था, इसका सबसे बड़ा सबूत है कि इसमें पैडलेस्टर बनाया गया है, जिस पर पूरी मूर्ति खड़ी है। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में जब कारीगरों ने इस विशाल प्रतिमा का निर्माण कर उसे प्रतिष्ठित रूप से सीधा स्थापित करने का प्रयास किया होगा, तब इसके अत्यधिक भार के वजह से ऐसा नहीं हो पाया संभवतः इसी कारण प्रतिमा को उसी अवस्था में छोड़ दिया गया, जिसमें वह आज भी दिखाई देती है।
मूर्ति को उठाया क्यों नहीं जा सका
तो अब एक प्रश्न आपके मन में आया कि जब विशाल पत्थर को उठाया जा सकता है तो मूर्ति को क्यों नहीं, तो इसका जवाब है पत्थर अनगढ़ था, उसे हाथियों इत्यादि कि मदद से किसी भी तरह घसीटते हुए भी लाया जा सकता है, लेकिन गढ़ी गई मूर्ति के लिए ऐसा संभव नहीं था, इससे उसे नुकसान पहुँच सकता था। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं- कालांतर में, जब बिड़ला कंपनी ने स्थल पर मंदिर निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ की, तो मूर्ति को पुनः उठाने का प्रयास किया गया, लेकिन अथक प्रयास के बाद भी मूर्ति को खड़ा नहीं किया जा सका और जबरस्ती खड़ा करने से इसको नुकसान होने अर्थात टूटने का डर था, जिसके बाद यह निर्णय लिया गया, कि लेटे हुए भैरव बाबा का मंदिर ही बनवा दिया जाए और उसके बाद भव्य मंदिर निर्माण प्रारंभ हुआ। इस
धार्मिक पर्यटन का केंद्र बना यह स्थान
कालभैरव की पूजा भय दूर करने और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने के लिए की जाती है, जो स्वयं भय के अधिपति होते हुए अपने भक्तों को भय से रक्षा प्रदान करते हैं। उनकी यह मूर्ति एक पहाड़ी जलधारा के मध्य में स्थित है, कालांतर में जब यहाँ नवनिर्माण हुए, तो जलधारा का प्रवाह स्टाप डैम और बहाव मार्ग बनाकर सीमित कर दिया गया। मंदिर के आस-पास और भी कई छोटे-छोटे मंदिर और मूर्तियाँ हैं। यह स्थान कैमोर पर्वतमाला से घिरा हुआ है, जिसके चारों ओर खुला प्राकृतिक ढलावनुमा क्षेत्र है, जो इस स्थान की खूबसूरती को बढ़ाता है और इसे धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है।

