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Gujarat High Court Verdict: सिर्फ मैरिज सर्टिफिकेट से शादी नहीं मानी जाएगी वैध, हिंदू रीति-रिवाज जरूरी

Gujarat High Court Verdict: गुजरात हाईकोर्ट (Gujarat High Court) ने हिंदू विवाह की वैधता (Marriage Validity) को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) की धारा 7 के तहत निर्धारित धार्मिक और सामाजिक रीति-रिवाजों के बिना केवल विवाह पंजीकरण (Marriage Registration) करा लेने या मैरिज सर्टिफिकेट (Marriage Certificate) प्राप्त कर लेने से शादी कानूनी रूप से वैध नहीं मानी जाएगी।

Gujarat High Court Verdict: गुजरात हाईकोर्ट (Gujarat High Court) ने हिंदू विवाह की वैधता (Validity of Marriage) को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र (Marriage Registration Certificate) के आधार पर किसी हिंदू विवाह को वैध नहीं माना जा सकता। यदि विवाह हिंदू रीति-रिवाजों और आवश्यक धार्मिक रस्मों (Hindu Rituals) के अनुसार संपन्न नहीं हुआ है, तो उसका कानूनी अस्तित्व स्वीकार नहीं किया जाएगा।

प्रवासी भारतीय की याचिका पर आया फैसला

यह मामला यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) में रहने वाले एक प्रवासी भारतीय (NRI) की याचिका से जुड़ा था। युवक ने गुजरात हाईकोर्ट में अपील करते हुए दावा किया कि उसका संबंधित महिला से कभी विधिवत विवाह नहीं हुआ। इससे पहले फैमिली कोर्ट (Family Court) ने कथित विवाह को अमान्य घोषित करने से इनकार कर दिया था, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 और 8 का किया उल्लेख

न्यायमूर्ति इलेश जे. वोरा और न्यायमूर्ति आर.टी. वाच्छानी की खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (Hindu Marriage Act) की धारा 7 के तहत विवाह तभी वैध माना जाएगा, जब वह निर्धारित धार्मिक और सामाजिक परंपराओं के अनुसार संपन्न हुआ हो। वहीं धारा 8 के तहत जारी विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र केवल ऐसे विवाह का प्रमाण होता है, जो पहले ही विधिवत संपन्न हो चुका हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल विवाह का पंजीकरण (Marriage Registration) करा लेने से उसकी कानूनी वैधता स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती।

महिला ने खुद को बताया था कानूनी पत्नी

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उसे कथित विवाह की जानकारी तब मिली, जब एक महिला उसके माता-पिता के पास विवाह प्रमाण पत्र लेकर पहुंची और स्वयं को उसकी कानूनी पत्नी बताया। युवक का कहना था कि उसने कभी महिला से शादी नहीं की और दोनों कभी पति-पत्नी के रूप में साथ भी नहीं रहे।

नौकरी के दबाव में दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराने का आरोप

युवक ने आरोप लगाया कि वह महिला के पिता की कंपनी में कार्यरत था। इसी दौरान उसे पदोन्नति (Promotion) का लालच दिया गया या नौकरी से निकालने की धमकी देकर विवाह से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवा लिए गए। उसके अनुसार दोनों के बीच कभी कोई वैवाहिक समारोह या हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह नहीं हुआ।

महिला ने भी स्वीकार किया, नहीं हुई थीं शादी की रस्में

सुनवाई के दौरान महिला ने भी लिखित जवाब में स्वीकार किया कि दोनों के बीच हिंदू विवाह की आवश्यक रस्में कभी संपन्न नहीं हुई थीं। उसने यह भी माना कि दोनों के बीच कोई वैध वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं हुआ था। इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने विवाह प्रमाण पत्र के आधार पर विस्तृत सुनवाई की आवश्यकता बताते हुए विवाह को अमान्य घोषित करने से इनकार कर दिया था।

हाईकोर्ट ने खत्म की कानूनी लड़ाई

हाईकोर्ट ने कहा कि जब दोनों पक्षों में से एक पक्ष स्वयं यह स्वीकार कर चुका है कि हिंदू विवाह की अनिवार्य रस्में पूरी नहीं हुईं, तो ऐसे मामले में लंबी न्यायिक प्रक्रिया (Legal Proceedings) जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है। इसी आधार पर अदालत ने कथित विवाह को शून्य (Void Marriage) घोषित कर दिया।

क्या है फैसले का महत्व?

इस फैसले से साफ हो गया है कि हिंदू विवाह की कानूनी मान्यता केवल Marriage Certificate पर निर्भर नहीं करती। विवाह की वैधता के लिए हिंदू विवाह अधिनियम के तहत निर्धारित धार्मिक और पारंपरिक रस्मों का पालन आवश्यक है। यदि ये आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी नहीं होती हैं, तो केवल पंजीकरण के आधार पर विवाह को वैध नहीं माना जाएगा।

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