Goa Liberation Movement | गोवा मुक्ति में विंध्य का योगदान

Historical image representing the Goa Liberation Movement and contributions from the Vindhya region.

Goa Liberation Movement: भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के हर अध्याय में रीवा और विंध्य क्षेत्र के लोगों का संघर्ष स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। 1857 की क्रांति से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक, इस धरा के सपूतों ने हँसते-हँसते देश पर अपना सब कुछ न्योछावर किया। जब आज़ाद भारत में लोहिया ने गोवा मुक्ति का शंखनाद किया, तो विंध्य की यह परंपरा एकबार फिर से जागी और यहाँ के आंदोलनकारी, अपने प्राणों के भय के बिना गोवा की आज़ादी के लिए संकल्पबद्ध होकर उठ खड़े हुए और गोवा मुक्ति आंदोलन में कूद पड़े।

द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बदलती वैश्विक राजनीति

द्वितीय विश्व के समाप्त होते ही विश्व में एक बड़ा परिवर्तन दिखाई देने लगा। युद्ध से कमजोर पड़े ब्रिटेन, फ्रांस, हॉलैंड और अन्य यूरोपीय शक्तियों के स्थान पर अब अमेरिका और सोवियत संघ दो नए महाशक्ति बनकर उभरे। साम्राज्यवाद की पुरानी संरचना अब ढह चुकी थी और यूरोपीय औपनिवेशिक साम्राज्य अपनी राजनैतिक, आर्थिक और नैतिक साख लगातार खो रहे थे। यही कारण था कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में फैले उनके उपनिवेशों में स्वतंत्रता आंदोलनों की भावना तीव्र हो रही थी। इन्हीं परिस्थितियों के बीच भारत ने भी दो सौ वर्षों की दासता के बाद 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की।

भारत की अधूरी भौगोलिक एकता

लेकिन इस राजनैतिक स्वतंत्रता के बाद भी भारत की भौगोलिक एकता अभी अधूरी थी। पांडिचेरी, कराइकल और माहे जैसे क्षेत्र फ्रांस के नियंत्रण में थे। जबकि गोवा, दमन-दीव और दादरा नगर हवेली पुर्तगाल के उपनिवेश बने हुए थे। हालांकि फ्रांस ने तो जनभावनाओं का सम्मान करते हुए 1954 में पांडिचेरी और अन्य क्षेत्रों को शांतिपूर्ण ढंग से भारत को सौंप दिया। लेकिन पुर्तगाल का रवैया इससे ठीक विपरीत था, वह गोवा को भारत का हिस्सा नहीं मानता था और किसी भी परिस्थिति में उसे छोड़ने को तैयार नहीं था।

गोवा भारत में पहला यूरोपीय उपनिवेश

इतिहास में देखे तो भारत में गोवा ही सबसे पहले यूरोपीय उपनिवेश बना था, जब 1510 में पुर्तगालियों ने अल्बुकर्क के नेतृत्व में बीजापुर के सुल्तान यूसुफ आदिलशाह को पराजित करके गोवा पर विजय प्राप्त की थी। बताया जाता है पुर्तगालियों का शासन अंग्रेजों से बहुत ज्यादा कठोर था, जिसकी चर्चा बहुत कम होती है। खैर भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के प्रभाव के कारण गोवा में कुछ राजनैतिक आंदोलन हो रहे थे।

गोवा को लेकर कांग्रेस की उदासीनता

लेकिन यह निराशाजनक था, भारत में ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन की अगुआ कांग्रेस और उसका केंद्रीय नेतृत्व गोवा को लेकर उदासीन था। लेकिन सोशलिस्ट गोवा की इस गुलामी से चिंतित थे, उसकी पीड़ा को सबसे पहले महसूस किया सोशलिस्ट नेता डॉ राममनोहर लोहिया ने जब 1946 में अपने एक दोस्त के निमंत्रण पर स्वास्थ्य लाभ के लिए गोवा में ठहरे थे, वहाँ उन्हें पता चला पुर्तगाल सरकार ने गोवा में इतने सख्त प्रतिबंध लगा रखे हैं, जितने ब्रिटेन ने भारत में नहीं लगा रखे थे। जिसके बाद लोहिया ने वहाँ एक छोटी सी सार्वजनिक सभा की जिसके बाद पुर्तगालियों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और गोवा की सीमा से बाहर निकाल दिया। लोहिया की गिरफ़्तारी के बाद भी महात्मा गांधी हरिजन पर लेख लिखकर पुर्तगाली शासन के इस कृत्य का विरोध किया, लेकिन गांधी के अतिरिक्त दूसरे कांग्रेस नेता पहले की तरह गोवा पर उदासीन ही रहे। लेकिन कालांतर में सोशलिस्टों के समर्थन से गोवा के अंदर ही, गोवा मुक्ति के लिए लड़ाकुओं का एक गोमांतक दल बन गया। आज़ादी के बाद पंडित नेहरु की सरकार दरसल गोवा को लेकर दुविधा में थी, कारण था भारत की अहिंसक छवि और पुर्तगाल का नाटो का सदस्य होना, इसीलिए प्रारंभ में वह सैन्य कार्यवाई के विरुद्ध थे और गोवा का शांतिपूर्ण हल चाहते थे।

लोहिया का गोवा मुक्ति का संकल्प

अब सरकार जब कुछ नहीं कर पा रही थी, तो अब जरूरत थी एक विशाल जनआंदोलन की, लेकिन आंदोलन करे कौन। आजादी की लड़ाई की अगुआ कांग्रेस देश में शासन कर रही थी, इसीलिए किसी को आगे बढ़ना ही था, जिसके बाद इसका बीड़ा उठाया सोशलिस्टों ने। वर्ष 1955 जब डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में समाजवादियों ने महात्मा गांधी के सत्याग्रह के सिद्धांतों को आधार बनाकर गोवा मुक्ति आंदोलन छेड़ा था, लोहिया पहले ही गोवा में अनाधिकृत प्रवेश के बाद गिरफ्तार हो चुके थे और पुर्तगाली पुलिस की कैद में थे।

समाजवादियों का गोवा मुक्ति को लेकर संघर्ष

इसके साथ 80 वर्षीय वयोवृद्ध सोशलिस्ट नेता सेनापति बापट और एन. जी. गोरे अपने साथियों के साथ 18 मई को गोवा में अनधिकृत प्रवेश कर गए। इनमें से कई पुर्तगाली पुलिस की बर्बरता का शिकार हुए, कई गिरफ्तार कर जेल में ठूंस दिए गए। इसके बाद सोशलिस्टों ने पीटर एल्वारिस और एम. एस. जोशी के नेतृत्व में, पुर्तगालियों के विरुद्ध देश की आजादी के दिन 15 अगस्त को, चारों दिशाओं से गोवा में प्रवेश करने की योजना बनाई। भारत के नौजवान गुलामी के इस कलंक को मिटाने के सर में कफन बांधकर निकल पड़े, “गोवा को आजाद करवाना है” के नारे के साथ पूरे देशभर से सोशलिस्ट कार्यकर्ता गोवा जाने की तैयारी करने लगे।

गोवा मुक्ति में विंध्य का योगदान | Vindhya’s contribution in the Goa Liberation Movement

किन्तु गोवा में आंदोलनकारियों का जो दमन हो रह था, वह रोंगटे खड़ा कर देने वाला था, पुर्तगाली पुलिस की निर्ममता और बर्बरता की खूब खबरें आती थीं, लेकिन इसके बाद भी विंध्य के कई सोशलिस्ट युवा राष्ट्रभक्त युवा नेताओं ने भी इस आंदोलन रूपी यज्ञ में भाग लेने का निश्चय किया। चंद्रप्रताप तिवारी और यमुना प्रसाद शास्त्री के नेतृत्व में विंध्य से 19 सदस्यीय प्रतिनिधि दल यात्रा पर निकला। इस दल में चंद्रप्रताप तिवारी और शास्त्री जी के अतिरिक्त रीवा से अवधराज सिंह, जनार्दन प्रसाद शुक्ल, ज्ञानदत्त, बाबूलाल, रामलखन और श्याम बिहारी शामिल थे। जबकि सतना से भैया बहादुर सिंह, योगेश्वर प्रसाद, शील कुमार, सीताराम नैपाली और और सूर्यप्रताप गौतम शामिल थे, सीधी से बांकेलाल बैगा और रामभजन सिंह शामिल हुए थे। बुंदेलखंड के टीकमगढ़ से से लक्ष्मीनारायण नायक, विक्रम सिंह यादव और पृथ्वी विश्वकर्मा शामिल थे। जबकि छत्तरपुर के भार्गव जी मुंबई में आकर इस दल में शामिल हुए।

आंदोलन समिति की योजना

देशभर के सोशलिस्टों का दल कर्नाटक के बेलगाम में आकर इकट्ठा होने लगा। आंदोलन समिति की तरफ से गोवा प्रवेश की विधि और योजना समझाई गई। जिसके अनुसार अपना अतिरिक्त सामान बेलगाम में ही छोड़कर गोवा प्रवेश करना होगा। गोवा में प्रवेश के समय की घटना का जिक्र चंद्रप्रताप तिवारी ने अपनी किताब “नासमझी के चालीस वर्ष” में विस्तार से किया है। जिसके अनुसार- दरसल आंदोलन समिति की तरफ से साफ निर्देश दिए गए थे, कि पुर्तगाली आँसू गैस के गोले छोड़ सकते हैं, इसके लिए सबके पास एक गीला रुमाल जरूर होनी चाहिए।

शास्त्री जी और चंद्रप्रताप तिवारी जी के बीच अनबन

अब चूंकि आंदोलनकारी माथे पर कफन बांध कर आए थे, लेकिन तिवारी जी ने सोचा सब लोग तो शहीद हो नहीं जाएंगे, कुछ लोग घर भी लौटेंगे, हाथ भी तंग हैं और फिर बचे हुए लोग घर कैसे लौटेंगे, यही सोचकर तिवारी जी ने नए रूमालों की जगह, अपने पुराने कुर्तों को फाड़कर रुमाल बनवाए। अब बाकि लोगों ने रुमाल ले लिया, लेकिन शास्त्री जी ने व्यंग्यवश कहा, अंतिम समय में तो कफन भी नया होता है और रुमाल पुराना, नया मंगाना चाहिए था। तिवारी जी ने सहज विनोद में कहा- बाकि सब लोग तो रुमाल रखते हैं, लेकिन वह पुराने में ही खुश हैं और आप तो रुमाल रखते ही नहीं, फिर भी नया रुमाल चाहिए आपको। जिसके बाद दल के बाकी साथी सदस्य शास्त्री जी से हंसी-मजाक करने लगे और शास्त्री जी चिढ़ गए, उन्होंने रुमाल फेंक दिया। इस वाकये के बाद शास्त्री जी और तिवारी जी के मध्य अनबोला हो गया। अब तिवारी जी चलते-चलते थक जाते थे, उनके बदन में दर्द और जकड़न होने लगता है। शास्त्री जी कभी-कभी तिवारी जी को अपने पैरों से दबाते थे, जिसे अपने बघेली भाषा में कचरना कहते हैं। लेकिन अब उनसे भी अनबोला था। तो उन्होंने अपने एक अन्य साथी अवधराज सिंह से ऐसा करने का आग्रह किया, अवधराज सिंह उनका शरीर दबाते हुए और शास्त्री जी को हँसाने और बुलवाने की गरज से विनोद करते, कल से मैं भी नए रुमाल के लिए रूठ जाऊंगा, उनका ऐसा कहना होता था, कि सब हंसने लगते, शास्त्री जी भी प्रत्यक्ष नहीं पर मुंह फेर कर हंसने लगते थे।

सशोली से गोवा सीमा तक पदयात्रा

खैर तिवारी जी अपने किताब में लिखते हैं, सशोली जाते समय रास्ते में स्थानीय लोग, हमें खाने-पीने की चीजें दे जाते थे, ना वो हमारी भाषा समझते थे और ना हम उनकी, लेकिन राष्ट्रप्रेम दोनों ही तरफ ही था, जो हमें जोड़ता था। तीन दिन की पदयात्रा के बाद 14 अगस्त की शाम को यह दल ससोली पहुंचा जहाँ पर पंजाब और मंगलोर समेत और भी तीन दल इनसे आकर मिले। योजनानुसार अगले दिन 15 अगस्त की सुबह इन्हें गोवा में प्रवेश करना था। चंद्रप्रताप तिवारी लिखते हैं उस रात सभी सत्याग्रहियों ने गृहस्थी संबंधी अपनी प्राथमिकताएं बताईं, जिससे यदि कोई जीवित घर लौटे तो उनके घर तक यह संदेश पहुंचा दे। लेकिन दृढ़निश्चयी यमुना प्रसाद शास्त्री गंभीरभाव से चुप रहे वह कुछ नहीं बोले।

‘रघुपति राघव राजा राम’ की धुन के साथ आगे बढ़े सत्याग्रही

समिति ने चारों दलों को क्रम से पंक्तिबद्ध किया था और आगे बढ़ने की पहली जिम्मेदारी विंध्य के जत्थे को सौंपी गई। योजनानुसार दल के नेता होने के नाते चंद्रप्रताप तिवारी सबसे आगे तिरंगा लेकर चलने वाले थे। लक्ष्य था गोवा की राजधानी पणजी में तिरंगा फहराना। अगर दल के नेता की गिरफ़्तारी होती है या वह घायल होते हैं, तो दल का दूसरा नेता तिरंगा थाम के आगे बढ़ने लगेगा। सुबह सर्वप्रथम सबने एक गहरे स्वच्छ नाले में स्नान किया, पास में मंदिर में ईश्वर आराधना हुई, फिर सबको तुलसीदल दिया गया और समिति के आदेश से 84 सदस्यीय सत्याग्रहियों का दल गोवा की सीमा की ओर बढ़ चला। तिवारी जी तिरंगा उठाए सबसे आगे बढ़ रहे थे। विंध्य दल उनके पीछे ‘रघुपति राघव राजा राम’ गाता हुआ आगे बढ़ रहा था। रास्ते में पुर्तगाली सैनिक बंदूकें ताने खड़े थे। वे बार-बार रुकने की चेतावनी देते, परंतु ये जोशीले सोशलिस्ट कहाँ रुकने वाले थे। जीवन का जोखिम उठाकर यह दल आगे बढ़ता रहा। इसी दौरान रास्ते में एक पुलिस थाने पर तिरंगा फहरा दिया गया और जत्था आगे निकल गया। पुर्तगालियों ने भय के कारण पूरे गोवा में कड़ी सख्ती कर रखी थी, इसीलिए गाँवों में सन्नाटा और रास्तों पर खामोशी। उन्हें डर था कि भारतीय सत्याग्रहियों के साथ कहीं गोवा के लोग भी न जुड़ जाएँ।

पुर्तगाली पुलिस द्वारा निहत्थे सत्याग्रहियों पर फायरिंग

सत्याग्रहियों के लगातार आगे बढ़ने के कारण, धीरे-धीरे पुर्तगाली सिपाही उत्तेजित होते गए। जब वे सत्याग्रहियों को रोकने में असफल रहे, तो पीछे से बिना किसी चेतावनी के फायरिंग शुरू कर दी। समिति के निर्देशानुसार सभी सत्याग्रही तुरंत जमीन पर लेट गए। गोलियों की आवाज थमने के बाद उठे तो कई साथी गंभीर रूप से घायल पाए गए। विंध्य दल के विक्रम यादव भी उसी गोलीबारी में घायल हुए थे। चंद्रप्रताप तिवारी और अन्य साथियों ने घायलों को सँभाला और उन्हें लेकर सशोली कैंप की ओर भागे। रास्ते में पुर्तगालियों ने फिर अवरोध किया, पर लंबी बहस के बाद बिना अधिक बाधा दिए भारतीय सीमा तक लौटने दिया।

सत्याग्रहियों का आगे बढ़ने का संकल्प

लेकिन उधर गोवा मार्ग पर अभी भी बहुत सारे सत्याग्रही डटे हुए थे। जिनमें विंध्यक्षेत्र से यमुना प्रसाद शास्त्री और बाँके बैगा भी थे, दोनों लगातार आगे बढ़ते रहे। इधर कैंप में साथियों को चिंता सता रही थी, पर आंदोलन समिति के निर्देश स्पष्ट थे- सब कुछ योजना के अनुसार ही होगा, अभी कोई नहीं जाएगा। रात ढलने लगी थी, कैंप में बेचैनी बढ़ती जा रही थी। इसी बीच गोवा में पुर्तगाली सेना का तांडव चरम पर था। वे घायलों और मृतकों को लाकर गोवा सीमा पर फेंक जाते, जहाँ भारतीय पुलिस उन्हें उठाकर अस्पताल और कैंपों में पहुँचा देती थीं। सुबह से भारतीय पुलिस की लारियाँ घायलों को लेकर आने लगीं। सत्याग्रही दौड़कर घायलों को अस्पताल पहुँचाने लगे और साथियों की सेवा सुश्रुषा में लग जाते थे।

यमुना प्रसाद शास्त्री हुए पुलिस बर्बरता का शिकार

कुछ देर बाद तीसरी गाड़ी आई, उसमें शास्त्री जी और बाँके बैगा भी थे, बाँके बैगा को मामूली चोटें थीं, पर शास्त्री जी बुरी तरह घायल थे, वह पुर्तगाली पुलिस के बर्बरता का शिकार हुए थे, उनका एक हाथ टूट चुका था। चंद्रप्रताप तिवारी और सभी साथी दौड़कर गाड़ी तक पहुँचे। अपने साथी को पहचानते ही तिवारी जी ने पूछा-अब दर्द कैसा है, शास्त्री जी? उन्होंने कराहते हुए कहा- बहुत ज्यादा दर्द है, शास्त्री जी को तुरंत अस्पताल पहुँचाया गया। सभी साथी प्रसन्न हुए दोनों कुशलतापूर्वक लौट आए थे, लेकिन उससे भी ज्यादा प्रसन्नता इस बात की थी, कि शास्त्री जी का मौन व्रत भी टूट गया।

ऑपरेशन विजय और गोवा की मुक्ति

इस गोवा मुक्ति आंदोलन में तीन से चार हजार सत्याग्रहियों ने भाग लिया था, जिसमें अधिकांश लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था, कुछ लापता हो गए थे, लगभग 30 सत्याग्रहियों की पुलिस बर्बरता से मृत्यु हो गई थी, ढाई सौ से भी ज्यादा लोग घायल हुए थे, इसी बीच भारत सरकार ने देश को आश्वासन दिया वह जल्द ही गोवा को पुर्तगाल उपनिवेश से मुक्त करवाएंगे जिसके बाद सर्वदलीय बैठक में यह निर्णय लिया गया फिलहाल आंदोलन को स्थगित किया जाएगा, जिसके बाद गोवा मुक्ति आंदोलन धीमा पड़ गया। बाद में भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय चलाकर 19 दिसंबर 1961 को गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त करवा लिया।

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