Gandhi Jayanti। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 157वीं जयंती पर देश ही नही दुनिया भर के लोग अपनी श्रद्धाजलि देकर उन्हे नमन कर रहे है। इस दौरान गांधी के उन विचारों को भी लोग याद करने से अपने आप को नही रोक पा रहे है, जो कि आज भी पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक हैं। गांधी जी के ऐसे विचारों में सत्य, अहिंसा, स्वच्छता और स्वदेशी का नारा हर देश के लिए एक आर्दश है। इसके एक-एक शब्द में सच्चाई, अच्छाई, सफाई और देश प्रेम भरा हुआ है।
गुजरात में हुआ था जन्म
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर, गुजरात में हुआ था। इस दिन देश भर में आयोजन किए जा रहे है। देश के राजनायक स्वयं गांधी जी के विचारों को जन-जन तक पहुचाने के लिए आयोजनों में हिस्सा ले रहे है। यह दिन भारत के तीन राष्ट्रीय अवकाशों में से एक है। इस दिन देश भर में सरकारी कार्यालयों, स्कूलों और संस्थानों में अवकाश रहता है और बापू को श्रद्धांजलि दी जाती है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2007 से 2 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मना रहा है।
राष्ट्रपिता की ऐसे मिली थी उपाधी
महात्मा गांधी को सबसे पहले नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को सिंगापुर रेडियो (आज़ाद हिंद रेडियो) से देश के नाम जारी एक संदेश में राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया था। गांधीजी के निधन (30 जनवरी 1948) के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भी रेडियो पर देश को संबोधित करते हुए उन्हें राष्ट्रपिता कहा था, जिससे यह नाम और अधिक प्रचलित हो गया। हालांकि, ऐतिहासिक और कानूनी रूप से भारत सरकार द्वारा किसी आधिकारिक आदेश के तहत यह उपाधि नहीं दी गई है।
गांधी जी का पूरा नाम
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था, जिनका जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ था। उनकी माता का नाम पुतलीबाई और पिता का करमचंद गांधी था। उनका विवाह वर्ष 1883 में मात्र 13 वर्ष की आयु में कस्तूरबा गांधी के साथ हुआ था। गांधी जी के चार पुत्र हरिलाल, मनिलाल, रामदास और देवदास थें, उन्होने लंदन से कानून की पढ़ाई (बैरिस्टर) किए थें।
प्रमुख जीवन घटनाएं एवं आंदोलन
महात्मा गांधी जी वर्ष 1893 में एक मुकदमे के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गए, जहां उन्होंने रंगभेद के खिलाफ सत्याग्रह का पहला प्रयोग किया। वर्ष 1915 में वे वापस भारत लौटे और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कमान संभाली। उन्होंने देश की आजादी के लिए सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, दांडी यात्रा और भारत छोड़ो आंदोलन (1942) जैसे बड़े आंदोलनों का नेतृत्व किया। उनका पूरा जीवन सत्य और अहिंसा के मार्ग को समर्पित रहा। 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली स्थित बिड़ला हाउस में नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी थी।

