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Galgotias University:हमारी मांगें पूरी करो, मांगें क्या हैं? पता नहीं!

Galgotias University:सोशल मीडिया पर जमकर एक वीडियो वायरल हो रहा है.ग्रेटर नॉएडा से कुछ युवा छात्र दिल्ली के कांग्रेस कार्यालय में प्रोटेस्ट के लिए आये हुए थे.इनके हाथों में थे बड़े पोस्टर्स,बैनर्स जिसमे ‘No Place for Urban Naxals in Viksit Bharat’,75 साल में दिया न जल,न बत्ती,अब छीनेंगे संपत्ति जैसे स्लोगन लिखे हुए थे.इससे पहले इन स्लोगन्स के विषय में बात करें।प्रोटेस्ट करने वालों के बारे में बात कर लेते हैं.ये छात्र थे ग्रेटर नॉएडा की Galgotia University के और विकसित भारत संगठन के बैनर तले ये विरोध प्रदर्शन हो रहा था.इन्ही सब के बीच आज तक के एक रिपोर्टर इन सब के बीच जा पहुंचे और छात्रों से प्रोटेस्ट से जुड़े सवाल जवाब करने लगे.इस दौरान कई छात्र सवाल पूछने पर इधर उधर बात घुमाते दिखे तो कुछ पोस्टर पर लिखे सेंटेंस तक नहीं पढ़ पा रहे थे.उनसे जब रिपोर्टर ने पोस्टर पर लिखे नारों का प्रसंग पूछा तो वो कुछ बता ही नहीं पाए.एक छात्र ने हाथ में नो प्लेस फॉर अर्बन नक्सल इन विकसित भारत का पोस्टर लिया हुआ था लेकिन जब रिपोर्टर ने इसका मतलब पूछा तो छात्र ने कहा कि उसे नहीं पता .इनका कहना था कि ये कांग्रेस के मैनिफेस्टो के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन जब इस बारे में पूछा गया तो वो मुँह ताकते रह गए.अब ऐसे विरोध प्रदर्शन को देख कर दुखी हुआ जाये या मज़ाक उड़ाया जाये समझ नहीं आ रहा.हालाँकि सोशल मीडिया की ऑडियंस मुद्दे पर अपनी क्रिएटिविटी दिखाने का मौका नहीं छोड़ रही है.मीम से लेकर रील्स तक.कुल मिलाकर ऐसा हिसाब लगाया जा रहा है कि ये एक पेड प्रोटेस्ट रहा होगा।

अजी! ऐसा ही था तो शिक्षित छात्रों को पैसे दे देते।शिक्षित से बात आती है कि अब जो शिक्षित होगा वो शायद मानेगा नहीं।पर मान भी सकता है शिक्षा और रोजगार आजकल सामानांतर नहीं चल रहे हैं. लेकिन फिर इसमें भी तर्क वितर्क है.एक शिक्षा का व्यावसायिक पक्ष है और जिस यूनिवर्सिटी के ये छात्र हैं उसकी वेबसाइट में हाइएस्ट इंटरनेशनल पैकेज लिखा हुई है, 1.5 करोड़।अब देख लीजिये आप.अगर ये बात सही है और अगर बात पैसों की है तो फिर इन छात्रों को देख कर लगता है इतना कमा कर भी क्या करियेगा?अब आप बोल सकते हैं कि ये Humanities के छात्र नहीं हैं,तो फिर आप प्रदर्शन में क्यों आये?आप बोलेंगे क्योंकि हम छात्र हैं लेकिन मुझे लगता नहीं कि आपको ये बोलना चाहिए क्योंकि फिर आपको पढ़ के आना चाहिए था।

इन सब से एक और विषय उठ कर सामने आता है छात्र राजनीति या छात्रसंघ के चुनाव।आज के सामाजिक परिवेश में हर किसी की अलग अलग राय है इसपर।एक वर्ग इसे लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा कहता है,वहीँ एक वर्ग है जो इसे पढ़ाई लिखाई में रोक मानता है लेकिन ये तर्क कुछ फिट नहीं बैठता क्योंकि पढ़ना लिखना तो राजनीति से जुड़ा हुआ है.हाँ,सामजिक विज्ञान के छात्रों की ओर इसका झुकाव ज्यादा है लेकिन एक युवा के रूप में ये हमारी सामाजिक जिम्मेदारी हो जाती है कि हम अपने आपको राजनीतिक रूप से शिक्षित करें और राजनीति शिक्षा से इतर नहीं है.बस जरुरी ये है कि ये स्वस्थ हो नाकि पूर्वाग्रह से ग्रसित।ये तो वो भारत है जहाँ चाणक्य ने राजनीति सिखाई थी.ये वो देश है जहाँ भगत सिंह,सुभाष चंद्र बोष,लाला राजपत राय ने खुद छात्रों के राजनीति में आने का पक्ष सामने रखा था.सुषमा स्वराज जैसे कितने ही नेता रहे हैं जिन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से की थी.

बात इतनी है कि देश हित में,ज्ञान और सत्य के परिणाम स्वरुप आयी राजनीतिक चेतना समाज,देश और विश्व का कल्याण करती है.हमे बस ये देखना है कि हम हमारे छात्रों को कैसी शिक्षा दे रहे हैं.

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