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Friendship Day फ्रेंडशिप-डेः कृष्ण और सुदामा की ऐसी दोस्ती

Friendship Day। आज देश भर में फ्रेंडशिप-डे मनाया जा रहा है। जो तथ्य मिलते है उसके तहत दोस्ती दिवस की शुरूआत 1958 में हुई थी, लेकिन जो गंथ्र है उनमें दोस्ती का बड़ा ही अच्छा इतिहास रहा है। द्वापर युग में तो श्रीकृष्ण और सुदामा की दोस्ती सच्ची मित्रता की मिशाल बनी और इस दोस्ती का उदाहरण आज भी लोग देते है। अब लोग दोस्त दिवस मना रहे और इसके लिए दोस्ती का रिबन पहना कर अपने दोस्तों को बंधाई दे रहे है।

भारत में ऐसे शुरू हुआ दोस्ती दिवस

दोस्त दिवस का जो उल्लेख मिलता है वह यह है कि भारत में फ्रेंडशिप डे हर साल अगस्त महीने के पहले रविवार को मनाया जाता है। वैश्विक स्तर पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस 30 जुलाई को घोषित किया गया है, लेकिन भारत और कई अन्य देशों में लोग इसे रविवार की छुट्टी होने के कारण अगस्त के पहले रविवार को मनाते हैं।

1958 से मनाया जा रहा फ्रेंडशिप डे

फ्रेंडशिप डे को लेकर जो जानकारी मिलती है उसके तहत साल 1958 में पराग्वे में डॉ. रेमन आर्टेमियो ब्राचो ने दोस्तों के बीच शांति और भाईचारे के लिए इस दिन का सुझाव दिया था। साल 2011 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस के रूप में मान्यता दी। भारत में यह दिन ग्रीटिंग कार्ड्स, सोशल मीडिया मैसेज और दोस्तों को फ्रेंडशिप बैंड बांधकर बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है।

श्रीकृष्ण और सुदामा की सच्ची मित्रता

श्रीकृष्ण और सुदामा की दोस्ती सच्ची मित्रता का सबसे महान और अमर उदाहरण है, जो यह सिखाती है कि दोस्ती में राजा और रंक, या अमीर और गरीब का कोई भेद नहीं होता, और यह धन या पद से नहीं बल्कि केवल प्रेम और समर्पण से जुड़ी होती है। दोनों ने महर्षि सांदीपनि के आश्रम में साथ शिक्षा पाई थी. समय बीतने के बाद कृष्ण द्वारका के राजा बने और सुदामा एक साधारण, गरीब ब्राह्मण रहे। जब सुदामा द्वारका पहुँचे, तो द्वारपाल से कृष्ण का मित्र सुनकर श्रीकृष्ण नंगे पैर ही उनसे मिलने दौड़ पड़े और उन्हें गले लगा लिए। सुदामा संकोचवश चावल (पोटली) छुपा रहे थे, लेकिन कृष्ण ने खुद छीनकर बड़े चाव से खाए। सुदामा ने कुछ नहीं माँगा, पर अंतर्यामी कृष्ण ने मित्र का बिना कहे ही सारा दुख-दर्द दूर कर दिया।

जंगल में लकड़ी काटने के दौरान हुई थी गहरी मित्रता

एक बार गुरुमाता ने दोनों को जंगल से लकड़ियां लाने भेजा था, जहाँ उनकी मित्रता गहरी हुई। शिक्षा पूरी होने के बाद कृष्ण द्वारका के राजा बने, जबकि सुदामा का जीवन बहुत गरीबी में बीता। पत्नी के आग्रह पर सुदामा कृष्ण से मिलने गए और अपने साथ पोटली में बंधे थोड़े से चावल (पहुंचने पर भेंट स्वरूप) ले गए। द्वारका पहुँचने पर कृष्ण ने राजा होते हुए भी नंगे पैर दौड़कर सुदामा को गले लगाया और आंसुओं से उनके पैर धोए। सुदामा ने अपनी गरीबी का जिक्र तक नहीं किया, लेकिन अंतर्यामी कृष्ण ने उनकी मदद कर दी। जब सुदामा अपने घर लौटे, तो उन्होंने झोपड़ी की जगह एक भव्य महल पाया।

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