बंगाल। पूर्व रेल मंत्री व बंगाल की राजनीति का चाणक्य’ कहे जाने वाले मुकुल रॉय का 71 वर्ष की आयु में निधन हो गया है। उन्होने कोलकाता के एक अस्पताल में सोमवार के तड़के अंतिम सांसें ले लिए। वे काफी समय से डिमेंशिया समेत कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित थे. उनके निधन से पश्चिम बंगाल समेत राजनीति क्षेत्र में शोक की लहर है।
युथ कांग्रेस से राजनीति की शुरूआत
मुकुल रॉय का राजनीतिक सफर काफ़ी उतार-चढ़ाव भरा रहा। उन्होंने बंगाल में यूथ कांग्रेस से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत किए थें। बाद में ममता बनर्जी के साथ मिलकर 1998 में ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस की स्थापना करने वालों में शामिल रहे। वे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सबसे करीबी सहयोगियों में गिने जाते थे और लंबे समय तक उनके रणनीतिकार के रूप में जाने गए। वे 2006 में राज्यसभा के लिए चुने गए और 2009 से 2012 तक तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा नेता रहे. यूपीए-2 सरकार में उन्होंने पहले जहाजरानी राज्य मंत्री के रूप में काम किया और बाद में 2011 से 2012 के बीच रेल मंत्री का दायित्व संभाला. उन्होंने यह पद पार्टी के ही नेता दिनेश त्रिवेदी की जगह लिया था. इसके अलावा वे शहरी विकास मंत्रालय से भी जुड़े रहे।
टीएमसी के रणनीतिकारों में रहे है मुकूल रॉय
तृणमूल कांग्रेस में मुकुल रॉय पार्टी के ‘नंबर दो’ नेता के तौर पर उभरे थें, क्योकि 34 साल पुराने वाम मोर्चा शासन को बंगाल से सामाप्त करवाने एवं 2011 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की ऐतिहासिक जीत के पीछे उनकी रणनीति को अहम माना गया। उन्होने सीपीएम एवं कांग्रेस के नेताओं को टीएमसी में शामिल करवाने में अंहम भूमिका निभाई थी।
दल बदल नेता के चलते चली गई थी विधायकी
दरअसल उनका नाम शारदा चिटफंड घोटाले और नारदा स्टिंग ऑपरेशन से जुड़ने के बाद विवादों में आ गया. पार्टी नेतृत्व से दूरी बढ़ने के बीच उन्हें 2017 में तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया. इसके बाद नवंबर 2017 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी जॉइन कर लिए। बंगाल में उन्होने बीजेपी को मजबूत बनाने में अपनी अंहम भूमिका निभाएं। वे 2020 में बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी बने. 2021 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बीजेपी के टिकट पर कृष्णानगर उत्तर से चुनाव जीता। बाद में टीएमसी में वापसी कर लिए। नवंबर 2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने दलबदल कानून के तहत उन्हें विधायक पद से अयोग्य करार दिया था, क्योंकि वे बीजेपी के टिकट पर चुने जाने के बाद सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस में लौट आए थे, हांलाकि स्वस्थ के चलते इसके बाद उनकी राजनैतिक सक्रियता कंम हो गई और अब माना जा रहा है कि बंगाल ने एक राजनैतिक योद्धा का खो दिया है।

