Manoj Kumar Death News In Hindi: न्यज़िया बेग़म- की मंज़िल अर्श ही होती है पर कल यानी 4 अप्रैल 2025 को एक ऐसा सितारा हमारे बीच से चला गया जिसने फिल्म जगत को ताउम्र रौशन किया। कभी अभिनेता बनके, कभी निर्देशक बनके, संवाद लिखके तो कभी पटकथा लेखक बनके। जी हां ये थे हरिकृष्ण गोस्वामी, जिन्होंने फिल्मों से जुड़ने के बाद अपना नाम मनोज कुमार कर लिया। क्योंकि वो यूसुफ खान के फैन थे और उन्होंने अपना नाम बदलकर दिलीप कुमार कर लिया था तो नाम तो उनको भी बदलना ही था, पर मनोज इसलिए रखा क्योंकि दिलीप साहब की 1949 की फिल्म “शबनम” उन्हें बहुत पसंद थी कई बार देखी भी और उसमें दिलीप जी का नाम मनोज था।
जन्म और बचपन
मनोज कुमार 24 जुलाई 1937 को ब्रिटिश इंडिया के एबटाबाद में पैदा हुए थे जो अब ख़ैबर पख्तूनख्वा यानी पाकिस्तान में है अगर आपको याद न हो तो हम आपको याद दिला दें कि ये वही जगह है जहां अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मारा था ।
इस जगह की बात चली है तो एक नज़र उनके बचपन पर डाल लेते हैं और आपको सुनाते हैं उनके बचपन का एक क़िस्सा जो उनकी शख्सियत को बयान करता है तो हुआ यूं कि मनोज जी कुछ दस बरस के रहे होंगे तब उनके छोटे भाई कुक्कू पैदा हुए और कुछ दिनों बाद उनकी मां और भाई कि तबियत खराब हो गई जिसकी वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पड़ा पर अचानक वहां दंगे भड़क उठे हॉस्पिटल में अफरा तफरी मच गई डॉक्टर और नर्स सब अपनी जान बचा कर भागने लगे, मरीज़ परेशान हो गए और लापरवाही की वजह से उनके भाई ने भी दम तोड़ दिया मां की हालत बहुत बिगड़ गई लेकिन डॉक्टर चुप कर बैठे थे इलाज करने नहीं आ रहे थे ऐसे में इस 10 साल के बच्चे ने डंडा उठा लिया और उसके ज़ोर पर डॉक्टरों को अपनी मां के इलाज के लिए ले आया और पिता जी के समझाने पर ही डंडा नीचे रखा ऐसे हालात देखकर उनका परिवार जल्द ही वहां से दिल्ली आ गया लेकिन इतनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा कि क़रीब दो महीने तक कहीं आसरा न मिला और पूरा परिवार रिफ्यूजी कैंप में रहा ।
मनोज कुमार ने एक छोटा सा रोल निभाकार की अपनी कैरियर की शुरुआत
ख़ैर किसी तरह ज़िंदगी की गाड़ी पटरी पर आई, मनोज जी की पढ़ाई पूरी हुई काम की तलाश में निकले तो एक स्टूडियो के बाहर पहुंच गए जहां उन्हें लाइट सेटिंग में हेल्पर का काम मिल गया, वो लाइट जो हीरो पर पड़ने वाली होती थी उसे सेट करने से पहले किसी और पर चेक किया जाता था जिसके लिए उन्हें खड़ा किया गया ,बस फिर क्या था लाइट पड़ते ही उनके चेहरे ने कमाल कर दिया मानो कैमरे ने कह दिया ,यही चेहरा है जो मेरे लिए है और ये आवाज़ वहां मौजूद एक पारखी डायरेक्टर लखराज भाकरी तक पहुंची और बस उन्होंने मनोज जी को 1957 में आई फिल्म” फैशन “में एक छोटा सा रोल दे दिया ,
हालांकि अपनी इस पहली अदाकारी के लिए मनोज जी को ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी क्योंकि वो असल ज़िंदगी में भी नायक थे थकना वो जानते नहीं थे, अपने हक़ की चीज़ लड़ झगड़ के भी लेना जानते थे ,सही ग़लत का सटीक पैमाना था उनके पास, ख़ुद्दारी चेहरे से झलकती थी ,खुदा ने नैन नक्श भी इतने तीखे दिए थे कि नज़र नहीं हटती थी उनके सरापा- ए- हुस्न से ।
फिर क्या था उनकी इस छोटी सी भूमिका कई दिलों में गहरी छाप छोड़ गई
जब लाल बहादुर शास्त्री की सलाह पर बनाई देशभक्ति की फिल्में
और इसी की बदौलत 1960 की फिल्म कांच की गुड़िया में उन्हें मुख्य भूमिका मिल गई जिसकी कमियाबी ने उन्हें बैक-टु-बैक रेशमी रुमाल, चांद, बनारसी ठग, गृहस्थी, अपने हुए पराए, वो कौन थी जैसी कई फिल्में दिलाईं और वो एक जगमगाता सितारा बन गए।
1965 की फिल्म शहीद के बारे में हम आपको बता दें कि वो भगत सिंह के किरदार में केवल हमें ही नहीं भाए थे बल्कि लाल बहादुर शास्त्री जी को भी बहुत पसंद आए थे और इसे देखने के बाद उन्होंने अपने नारे “जय जवान जय किसान” को लेकर एक फिल्म बनाने को कहा ताकि मनोज जी की बेहतरीन अदाकारी से पूरे देश में एक क्रांति और जोश आ सके और इसके बाद ही मनोज जी फिल्म उपकार बनाई जो बतौर डायरेक्टर और राइटर उनकी पहली फिल्म थी इसलिए पहले उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था तो उन्होंने दिल्ली की टिकेट खरीदी और ट्रेन में बैठे बैठे सफर के दौरान पूरी कहानी लिखी ।
जब प्राण साहब को दिया सकारात्मक रोल
इस फिल्म से जुड़ी एक बात ये भी हम याद दिलाते चलें किनिगेटिव किरदार में दिखने वाले प्राण साहब को फ़िल्म ” आह” में मनोज जी ने एक साफ सुथरा किरदार दिया था, लेकिन वो लोगों को पसंद नहीं आए फिल्म फ्लॉप हो गई थी इसके बावजूद ” उपकार “में मनोज जी ने उन्हें साधू जैसे मलंग बाबा का रोल दिया जो सबको इतना पसंद आया कि उनकी इमेज ही बदल गई और तब से प्राण साहब हमें पॉज़िटिव रोल निभाते दिखने लगे ।
अपनी फिल्मों से दर्शकों के मन में छोड़ी अमिट छाप
मनोज जी की फिल्में इतनी प्रेरणा दायक होती थी कि हर फिल्म हमें कुछ न कुछ सिखा के जाती है फिर चाहे, वो शोर हो या रोटी कपड़ा और मकान। बतौर दिलकश हरदिल अज़ीज़ हीरो वो “दो बदन” , “पत्थर के सनम”और ” नील कमल “में अपनी अमित छाप छोड़ गए हैं पर ये सिलसिला यहां थमा नहीं उन्होंने हमें देशभक्ति से लबरेज़ कुछ ऐसी फिल्में दीं जैसे – शहीद, क्रांति, पूरब और पश्चिम और उपकार, कि उनके चाहने वालों ने उनका नाम भारत कुमार रख दिया। वह अपने अभिनय से हमेशा हमारे दिलों में जावेदाँ रहेंगे।
पुरस्कार और सम्मान
पुरस्कारों की बात करें तो, 1992 में आपको पद्मश्री से सम्मानित किया गया। 2016 में दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से नवाज़ा गया। 7 फिल्म फेयर पुरस्कार मिले थे। पहला फिल्म फेयर 1968 में फिल्म उपकार के लिए ही मिला था। जिसमें बेस्ट फिल्म, बेस्ट डायरेक्टर, बेस्ट स्टोरी और बेस्ट डायलॉग के लिए चार फिल्म फेयर अवॉर्ड आपने जीते।
मृत्यु पर प्रधानमंत्री ने जताया शोक
उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने ‘एक्स’ पर लिखा है – ‘महान अभिनेता और फिल्म निर्माता श्री मनोज कुमार जी के निधन से बहुत दुख हुआ। वो भारतीय सिनेमा के प्रतीक थे, जिन्हें विशेष रूप से उनकी देशभक्ति के उत्साह के लिए याद किया जाता था, जो उनकी फिल्मों में भी झलकता था। मनोज जी के कार्यों ने राष्ट्रीय गौरव की भावना को प्रज्ज्वलित किया और ये पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। दुख की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिवार और प्रशंसकों के साथ हैं।’ ओम शांति !