प्रशांत महासागर के गर्भ में एक बड़ी हलचल दर्ज की गई है, जिसने दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों को चिंता में डाल दिया है। यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ESA) के सैटेलाइट ने समुद्र के भीतर करीब 1000 किलोमीटर चौड़ी पानी की एक विशाल लहर को रिकॉर्ड किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना इस साल आने वाले अल नीनो का सबसे मजबूत और शुरुआती संकेत है। इसके चलते जून के महीने से ही अल नीनो का प्रभाव पूरी दुनिया के साथ-साथ भारतीय उपमहाद्वीप के मौसम तंत्र पर भी साफ दिखाई दे सकता है।
समुद्र के भीतर क्या बदलाव दिखे?
यूरोपीय स्पेस एजेंसी के एडवांस्ड सैटेलाइट्स ने प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र (Equatorial Region) की तस्वीरों और डेटा का विश्लेषण किया है। इस अध्ययन में समुद्र की सतह के नीचे पानी के तापमान और तरंगों के पैटर्न में अप्रत्याशित बदलाव सामने आए हैं। अंतरिक्ष से खोजी गई यह 1000 किलोमीटर चौड़ी जल तरंग इस बात की पुष्टि करती है कि महासागर के नीचे गर्म पानी का एक बड़ा हिस्सा पूर्व की ओर बढ़ रहा है।
मौसम विज्ञान की भाषा में इसे ‘केल्विन वेव’ भी कहा जाता है, जो अक्सर एक बड़े मौसमी बदलाव की नींव रखती है। जब भी यह लहर सक्रिय होती है, तो यह मानसूनी हवाओं की सामान्य गति को बाधित करती है।
जून महीने से बदल सकता है मौसम का मिजाज
आमतौर पर प्रशांत महासागर के पश्चिमी हिस्से में गर्म पानी और पूर्वी हिस्से में ठंडा पानी जमा रहता है। लेकिन इस बार स्थितियां तेजी से उलट रही हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, महासागरीय धाराओं का यह नया रुख जून की शुरुआत से ही वैश्विक स्तर पर असर दिखाना शुरू कर देगा।
इसके परिणामस्वरूप मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक दर्ज किया जा सकता है। तापमान में होने वाली यह वृद्धि सीधे तौर पर वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण (Global Atmospheric Circulation) को प्रभावित करती है, जिससे दुनिया के कई हिस्सों में सूखे और कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश की स्थिति बनती है।
भारतीय मानसून पर अल नीनो का प्रभाव कितना गंभीर?
भारत के लिए यह खबर इसलिए संवेदनशील है क्योंकि देश की पूरी कृषि व्यवस्था और अर्थव्यवस्था काफी हद तक दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर करती है। ऐतिहासिक रूप से देखा गया है कि जब भी प्रशांत महासागर में यह घटना सक्रिय होती है, तब भारत में मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अल नीनो का प्रभाव मानसून के आगमन और उसके वितरण दोनों को बिगाड़ सकता है। यदि जून से यह स्थिति मजबूत होती है, तो देश के उत्तर-पश्चिमी और मध्य भागों में कम बारिश होने की आशंका बढ़ जाएगी। हालांकि, स्काईमेट और भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) जैसे संस्थान इस पर लगातार नजर बनाए हुए हैं ताकि समय रहते सटीक अनुमान जारी किए जा सकें।
पिछले अनुभवों से सतर्क रहने की जरूरत
अगर हम बीते दशकों के आंकड़ों को देखें, तो अल नीनो के कारण भारत को कई बार गंभीर सूखे का सामना करना पड़ा है। साल 2009 और 2014-15 के दौरान भी इसी मौसमी घटना की वजह से देश के कई राज्यों में फसलों को भारी नुकसान पहुंचा था और जलाशयों का जलस्तर खतरनाक स्तर तक नीचे चला गया था।
हालांकि, हर बार अल नीनो का असर एक जैसा नहीं होता। कभी-कभी ‘इंडियन ओशन डिपोल’ (IOD) जैसी अन्य समुद्री घटनाएं इसके नकारात्मक प्रभाव को कम कर देती हैं। लेकिन सैटेलाइट से मिली हालिया तस्वीरें इस बार प्रशासनिक स्तर पर पहले से ही ठोस रणनीति बनाने की चेतावनी दे रही हैं।
दुनिया के अन्य देशों पर कैसा होगा असर?
यह मौसमी बदलाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहने वाला है। प्रशांत महासागर में उठने वाली यह लहर पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करेगी। इसके कारण ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई हिस्सों में भीषण गर्मी और सूखे जैसे हालात पैदा हो सकते हैं, जिससे जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ जाती हैं।
इसके विपरीत, दक्षिण अमेरिका के तटीय देशों जैसे पेरू और इक्वाडोर में इसके प्रभाव से सामान्य से कहीं अधिक भारी बारिश और बाढ़ आने की आशंका रहती है। अमेरिकी मौसम एजेंसी एनओएए (NOAA) ने भी अपनी हालिया रिपोर्ट में इस बात के संकेत दिए हैं कि इस साल का अल नीनो काफी तीव्र हो सकता है।
क्या कृषि और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा असर?
कम बारिश की आशंका सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्यान्न उत्पादन को चोट पहुंचाती है। भारत में धान, सोयाबीन, मक्का और दलहन जैसी खरीफ फसलों की बुवाई जून और जुलाई के महीनों में ही की जाती है। यदि शुरुआती मानसून कमजोर रहता है, तो किसानों को बुवाई में देरी करनी पड़ सकती है, जिससे लागत बढ़ने और पैदावार घटने का जोखिम पैदा होता है।
इसके अतिरिक्त, पानी की कमी के कारण देश के प्रमुख बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं में बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। यही वजह है कि कृषि मंत्रालय और जल संसाधन विभाग ने अभी से ही विभिन्न राज्यों के साथ मिलकर आकस्मिक योजनाएं (Contingency Plans) तैयार करना शुरू कर दिया है।
FAQs
प्रश्न 1: अल नीनो क्या है और यह कैसे बनता है?
उत्तर: अल नीनो एक वैश्विक मौसमी घटना है, जो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने के कारण पैदा होती है। इसके कारण समुद्री हवाओं का प्राकृतिक चक्र कमजोर हो जाता है, जिससे दुनिया भर के मौसम पर सीधा असर पड़ता है।
प्रश्न 2: अल नीनो का प्रभाव भारत पर क्या पड़ता है?
उत्तर: भारत में अल नीनो का प्रभाव मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम मानसून को कमजोर करने के रूप में देखा जाता है। इसके कारण देश के कई हिस्सों में सामान्य से कम बारिश होती है, सूखे जैसे हालात बनते हैं और गर्मी का प्रकोप बढ़ जाता है, जिससे कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
प्रश्न 3: यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ESA) ने प्रशांत महासागर में क्या देखा है?
उत्तर: यूरोपीय स्पेस एजेंसी के सैटेलाइट्स ने प्रशांत महासागर के भीतर करीब 1000 किलोमीटर चौड़ी गर्म पानी की एक विशाल लहर (केल्विन वेव) दर्ज की है। वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्र के नीचे हो रही यह हलचल इस साल अल नीनो के तेजी से सक्रिय होने का स्पष्ट संकेत है।
प्रश्न 4: क्या अल नीनो के कारण हमेशा देश में सूखा ही पड़ता है?
उत्तर: अमूमन अल नीनो को कम बारिश या सूखे से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन हर बार इसका असर एक जैसा नहीं होता। यदि इसी दौरान हिंद महासागर में ‘इंडियन ओशन डिपोल’ (IOD) जैसी सकारात्मक मौसमी परिस्थितियां बनती हैं, तो अल नीनो का नकारात्मक प्रभाव काफी हद तक कम भी हो सकता है।
प्रश्न 5: इस साल अल नीनो का असर कब से शुरू होने की संभावना है?
उत्तर: वैश्विक मौसम वैज्ञानिकों और सैटेलाइट डेटा के विश्लेषण के अनुसार, जून के महीने से ही अल नीनो की स्थितियां पूरी तरह सक्रिय हो सकती हैं, जो आगामी मानसूनी सीजन के वितरण को प्रभावित कर सकती हैं।
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