भारत के केंद्रीय बजट से पहले पेश किया गया Economic Survey 2026 देश की आर्थिक सेहत का सबसे विश्वसनीय दस्तावेज़ है। यह सर्वेक्षण स्पष्ट करता है कि भारत ने 7% की विकास दर के साथ वैश्विक मंदी के डर को पीछे छोड़ दिया है। हालांकि, ‘शानदार आंकड़ों’ के इस लिफाफे के भीतर गिरते रुपये, घटते विदेशी निवेश और मैन्युफैक्चरिंग की सुस्त रफ़्तार जैसी गंभीर चेतावनियाँ भी छिपी हैं। यह लेख इस 400 पन्नों के दस्तावेज़ का सार और भविष्य का रोडमैप पेश करता है।
भारत की 7% ग्रोथ: दुनिया के लिए एक पहेली?
वैश्विक स्तर पर जब अमेरिका और यूरोप जैसे विकसित देश 2% की वृद्धि दर के लिए संघर्ष कर रहे हैं, भारत का 7% की दर से बढ़ना एक बड़ी उपलब्धि है। पिछले वित्त वर्ष (FY25) में आर्थिक सर्वेक्षण ने 6.3% से 6.8% की वृद्धि का अनुमान लगाया था, लेकिन वास्तविक आंकड़ों ने इन अनुमानों को पछाड़ दिया है। भारत लगातार चौथे साल दुनिया की सबसे तेज बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना हुआ है।
घरेलू खपत (Consumption): विकास का असली इंजन
इस बार की ग्रोथ का सबसे बड़ा श्रेय भारतीय परिवारों (Households) को जाता है।
- प्राइवेट कंजम्पशन: जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी बढ़कर 61.5% हो गई है, जो वित्त वर्ष 2012 के बाद सबसे अधिक है।
- महंगाई पर लगाम: हेडलाइन मुद्रास्फीति (Headline Inflation), जो FY23 में 6.7% थी, वह FY26 में घटकर महज 1.7% रह गई है।
- नतीजा: लोगों की ‘रियल इनकम’ (वास्तविक आय) में सुधार हुआ है, जिससे शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में खरीदारी बढ़ी है।
निवेश और बुनियादी ढांचा: पूंजीगत व्यय में उछाल
सरकार और निजी क्षेत्र द्वारा मशीनों, फैक्ट्रियों और सड़कों पर किया जा रहा निवेश (Capital Spending) अब जीडीपी का लगभग 30% है। बुनियादी ढांचे पर यह खर्च न केवल आज नौकरियां पैदा कर रहा है, बल्कि भविष्य के औद्योगिक विकास की नींव भी रख रहा है।
रुपया ₹92 के पार: आर्थिक विरोधाभास की चुनौती
आर्थिक सर्वेक्षण एक कड़वी सच्चाई को सामने लाता है—मजबूत आर्थिक बुनियादी ढांचे (Fundamentals) के बावजूद रुपये में अस्थिरता है। हाल ही में रुपया डॉलर के मुकाबले ₹92 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। सर्वेक्षण का तर्क: भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और विदेशी निवेशकों का ‘सुरक्षित ठिकानों’ (जैसे अमेरिकी ट्रेजरी) की ओर भागना भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए ‘कॉन्फिडेंस टैक्स’ जैसा है। भारत का राजकोषीय घाटा 4.8% पर नियंत्रित होने के बाद भी निवेशक जोखिम लेने से कतरा रहे हैं।

सर्विस बनाम मैन्युफैक्चरिंग: क्या मॉडल बदलने की जरूरत है?
भारत की सफलता अब तक सर्विस सेक्टर (IT, वित्त, परामर्श) पर टिकी रही है, जिसका निर्यात 6.5% की दर से बढ़ रहा है। लेकिन Economic Survey 2026 एक महत्वपूर्ण चेतावनी देता है:
- सर्विसेज से आय तो होती है, लेकिन यह विदेशी पूंजी पर निर्भरता कम नहीं करती।
- व्यापार घाटा (Trade Deficit) को स्थायी रूप से पाटने के लिए ‘बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग’ (Large-scale Manufacturing) अनिवार्य है।
- सर्वेक्षण ने पूर्वी एशियाई देशों (जापान, वियतनाम) का उदाहरण देते हुए कहा है कि केवल मैन्युफैक्चरिंग ही करेंसी को स्थिरता दे सकती है।
संरक्षणवाद को ‘ना’ और प्रतिस्पर्धा को ‘हां’
सरकार ने संकेत दिया है कि वह टैरिफ दीवारों (Tariff Walls) के पीछे छिपने के बजाय ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा बनना चाहती है। भारत-यूरोपीय संघ (EU) जैसे मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) का समर्थन करना इसी रणनीति का हिस्सा है। इसका उद्देश्य भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाना है, न कि उन्हें घरेलू बाजार तक सीमित रखना।
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