क्या आप जानते हैं उस्ताद ज़ाकिर हुसैन की ज़िंदगी से जुडी ये ख़ास बातें !

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Birth Anniversary of Ustad Zakir Hussain:

जिनके तबले के सुर और थाप को सुनकर लोग मजबूर हो जाते थे ‘वाह उस्ताद वाह ‘ वो कोई और नहीं ज़ाकिर हुसैन ही थे जिन्होंने देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में अपनी कला का परचम लहराया था पर इतने मशहूर ओ मारूफ होकर भी उस्ताद जी थे बड़े सादा और ख़ुश मिज़ाज थे और कहते थे मै ज़िंदगी भर एक शागिर्द की तरह बस सेहत कुछ सीखते रहना चाहता हूँ।

नौ मार्च 1951 को मुंबई में पैदा हुए ज़ाकिर हुसैन ,तबला वादक उस्ताद अल्ला रक्खा के बेटे थे और अपने वालिद से मिली विरासत को सँभालते हुए उन्होंनें महज़ तीन साल की उम्र में पखावज बजाना सीख लिया था यही नहीं श्लोक और मंत्र भी कंठस्थ कर लिए थे ,और कमाल की बात ये कि ज़ाकिर हुसैन ने 11 बरस की उम्र में ही अमेरिका में अपना पहला कॉन्सर्ट किया था और इसके बाद साल 1973 में अपना पहला एल्बम ‘लिविंग इन द मैटेरियल वर्ल्ड’ लॉन्च किया था।

तबला वादक का मुश्किल सफर :-

ये उपलब्धि सुनने में जितनी अच्छी लगती है उस छोटे बच्चे के लिए उस वक़्त उतनी ही मुश्किल थी जब वो उस्ताद ज़ाकिर हुसैन नहीं बना था उसके लिए तबले पर पकड़ बनाना उतना बड़ा काम नहीं था जितना उस तबले को लेकर जगह – जगह कॉन्सर्ट के लिए जाना क्योंकि तब इस ग्यारह -बारह साल के बच्चे के पास आरक्षित कोच नहीं हुआ करती थी।

संगीत उनकी इबादत था :-

आरक्षित सीट न होने की वजह से ज़ाकिर खुद अखबार बिछाकर नीचे बैठ जाते थे और तबले पर किसी का पैर या जूता ना लगे, इसलिए वो उसे अपनी गोद में रख लेते थे। ये ज़ाकिर की वो संगीत यात्रा थी जिसमें उन्हें अपने परिवार से मिलने तक का भी वक़्त नहीं रहता था।

भारतीय संगीत को अंतर्राष्ट्रीय मंच दिया

तमाम कठिनाइयों भरे रास्ते को पार करने के बाद उन्होंने दुनिया भर के लोगों के दिल में जगह बनाई। उनके हाँथों में ये हुनर था कि वो तबले के सुरों से सुनने वालों को मदहोश करके नई दुनिया में ले जाएँ इसी वजह से उन्हें “तबले का रॉकस्टार” कहा जाता था। 1970 के दशक में उन्होंने पश्चिमी संगीतकारों के साथ काम करके भारतीय संगीत को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहुंचाया , उनके लंबे बाल और जोशीला अंदाज़ किसी को भी उनके तबले की धुन की गिरफ्त में लेकर झूमने पर मजबूर कर देता था खासकर युवा उनके दीवाने थे ,उन्हें सुनने के बाद लोग क्लासिकल म्यूज़िक की तरफ खुद को जाने से रोक नहीं पाते थे।

नए प्रयोग ने रचा इतिहास :-

भारतीय शास्त्रीय संगीत में अमूल्य योगदान के लिए , साल 1988 में पद्मश्री और साल 2002 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। उस्ताद ज़ाकिर हुसैन ने प्रसिद्ध गिटारवादक जॉन मैकलॉघलिन के साथ मिलकर “शक्ति” नाम का एक फ्यूज़न म्यूज़िक बैंड भी बनाया था जो भारतीय शास्त्रीय संगीत और जैज़ संगीत का अद्भुत मिश्रण था जिसने पूरे विष के सामने एक नया प्रयोग पेश किया और भारतीय संगीत को पश्चिमी श्रोताओं के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया।

उनके ‘शक्ति’ बैंड ने ,ग्रैमी अवार्ड्स 2024 में, ग्लोबल म्यूजिक एल्बम विनर का खिताब जीता और इसी साल एक ही रात में तीन ट्रॉफियां जीतने वाले पहले भारतीय बनकर 66वें ग्रैमी अवार्ड्स में इतिहास रच दिया।

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