Aatm Manthan :कई बार दिल को समझाना पड़ता है कि ख़ुद को इतनी इम्पोर्टेंस नहीं देनी है कि मन में प्रभु का वास न हो सके और हम “मै” यानी अहंकार की चपेट में आ जाएँ पर कभी – कभी ज़रा सी ठोकर हमें बर्दाश्त नहीं होती और हम कह उठते हैं मुझे कोई ऐसा कैसे कह सकता है! मुझे कोई वैसा कैसे कह सकता है ! मै आख़िर मै हूँ! सबसे श्रेष्ठ ,सबसे बेहतर।
दोनों साथ क्यों नहीं रह सकते :-
कोशिश करनी चाहिए कि ऐसा ख्याल दिल में न आए अगर हम दुनिया से थोड़े विशेष हैं भी, हममें कुछ ख़ास है तो भी घमंड करने के बजाए उस ऊपर वाले का धन्यवाद देना चाहिए जिसने हमें ऐसी ख़ासियत से नवाज़ा है हमें इस लायक़ समझा है। क्योंकि मन में अगर प्रभु का वास करना हो तो अहम को ह्रदय से दूर करना ही होगा ऐसा करना इसलिए भी ज़रूरी है कि जब ह्रदय में अहंकार होता है तो वहाँ किसी और का स्थान नहीं होता हम किसी का सम्मान नहीं करते पर जब यहाँ परमात्मा का वास होता है तो हम दूसरों को सम्मान देते हैं निरंतर दुनिया से कुछ सीखते जाते हैं और हमारा विकास होता जाता है मगर दोनों के वास से हमें विपरीत सोच मिलती है इसलिए किसी भी हाल में अहंकार और भगवान साथ में नहीं रह सकते।
इस बारे में रहीमदास का कथन :-
इस बारे में रहीमदास जी कहते हैं – रहिमन गली है साँकरी, दूजो ना ठहराहिं। आपु अहै तो हरि नहीं, हरि तो आपुन नाहिं॥अर्थात मन की गली सँकरी होती है, उसमें एक साथ दो विपरीत सोच वाले लोग गुज़र कर ह्रदय में प्रवेश नहीं कर सकते जैसे अहंकार और हरि एक साथ नहीं रह सकते क्योंकि अहंकार के त्याग से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है। मन की गली में अगर दूसरों के लिए प्रेम और सम्मान है तभी उसमें प्रभु वास करेंगें अन्यथा नहीं। प्रेम हमें खुद को भूलना सिखाता है जो प्रभु प्राप्ति का मार्ग है तो वहीं अहंकार स्वयं को सर्वोप्परि मानते हुए खुद को भूलने नहीं देता। ग़ौर ज़रूर करियेगा इस बात पर फिर मिलेंगे आत्ममंथन की अगली कड़ी में धन्यवाद।

