रीवा। रीवा जिले में आवारा मवेशियों के संरक्षण और सुरक्षा के नाम पर बनाई गईं बड़ी-बड़ी गौशालाएं और प्रशासनिक दावे पूरी तरह फेल साबित हो रहे हैं। जमीनी हकीकत यह है कि सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी मवेशी आज भी सड़कों पर बेसहारा घूमने को मजबूर हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि नेशनल हाइवे से लेकर शहर के अंदरूनी मार्गों तक, हर तरफ आवारा पशुओं का ही डेरा है। इस बदइंतजामी के कारण आए दिन भीषण सड़क हादसे हो रहे हैं, जिनमें न सिर्फ मवेशी अकाल मौत का शिकार हो रहे हैं, बल्कि राहगीर और वाहन चालक भी अपनी जान गंवा रहे हैं।
हाइवे से लेकर शहर के मुख्य चौराहों तक मवेशियों का जमघट
सिर्फ नेशनल हाइवे ही नहीं, बल्कि रीवा शहर के भीतर के हालात भी दिन-ब-दिन बदतर होते जा रहे हैं। शहर के सबसे व्यस्ततम इलाकों में शुमार अमहिया रोड, संजय गांधी अस्पताल चौराहा और मॉडल रोड जैसी मुख्य सड़कों पर हर समय दर्जनों मवेशियों का जमावड़ा लगा रहता है। इस जमघट की वजह से शहर की यातायात व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। पीक ऑवर्स के दौरान इन सड़कों पर लंबा जाम लगना अब आम बात हो चुकी है। मवेशियों के अचानक वाहनों के सामने आ जाने से दोपहिया वाहन चालक अनियंत्रित होकर गिर रहे हैं, जिससे स्थानीय निवासियों और व्यापारियों में गहरा आक्रोश है।
नगर निगम की कार्यशैली पर उठे गंभीर सवाल
सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि शहर के मुख्य चौराहों पर लगातार हो रही दुर्घटनाओं और बदहाल ट्रैफिक के बावजूद जिम्मेदार अमला मूकदर्शक बना हुआ है। सड़कों से आवारा मवेशियों को पकड़कर कांजी हाउस या नजदीकी गौशालाओं तक पहुंचाने वाले नगर निगम के वाहन और उनका अमला मैदानी स्तर पर दूर-दूर तक कहीं नजर नहीं आ रहा है। स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि प्रशासन सिर्फ कागजों पर व्यवस्थाएं दुरुस्त होने का दावा करता है, जबकि हकीकत में सड़कों पर आवारा पशुओं को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। इस लापरवाही ने अब रीवा नगर निगम और जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली को पूरी तरह कठघरे में खड़ा कर दिया है।

