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Cheekatilo Movie Review: शोभिता धुलिपाला की फिल्म में कितना दम?

Poster of Cheekatilo movie featuring Sobhita Dhulipala and a blood-stained hand holding a knife.

Cheekatilo Movie Poster Featuring Sobhita Dhulipala

प्राइम वीडियो पर ‘मेड इन हेवन’ जैसी सीरीज से अपनी पहचान बनाने वाली अभिनेत्री शोभिता धुलिपाला एक बार फिर चर्चा में हैं। उनकी नई तेलुगु क्राइम थ्रिलर फिल्म ‘Cheekatilo’ ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हो चुकी है। यह फिल्म न केवल एक क्राइम मिस्ट्री है, बल्कि समाज में व्याप्त शोषण और उसे अनदेखा करने वाली प्रवृत्तियों पर भी कड़ा प्रहार करती है। हालांकि, दमदार विषय के बावजूद फिल्म कुछ मोर्चों पर कमजोर नजर आती है।

‘Cheekatilo’ की कहानी: पॉडकास्ट और पुराने घाव

फिल्म की कहानी संध्या नेल्लूरी (शोभिता धुलिपाला) के इर्द-गिर्द घूमती है। संध्या एक टीवी जर्नलिस्ट है, जो सनसनीखेज रिपोर्टिंग छोड़कर अपना खुद का एक स्वतंत्र पॉडकास्ट शुरू करती है। उसका उद्देश्य अपराध की खबरों को बिना किसी मिर्च-मसाले के, तथ्यों और संवेदनशीलता के साथ जनता के सामने लाना है। अपनी निजी जिंदगी में वह शादी के बंधन में बंधने वाली है, लेकिन अतीत की एक घटना आज भी उसका पीछा नहीं छोड़ रही है।

कहानी में मोड़ तब आता है जब एक सीरियल किलर शहर में खौफ पैदा कर देता है। दिलचस्प बात यह है कि यह कातिल संध्या के काम और उसके व्यक्तित्व से काफी प्रभावित है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, संध्या इस केस में गहराई से उलझती जाती है।

Shobhita Dhulipala’s podcaster avatar in Cheekatilo Movie Review

समाज की संवेदनहीनता पर प्रहार

निर्देशक शरण कोप्पिसेट्टी ने इस फिल्म के जरिए यह दिखाने की कोशिश की है कि समाज कैसे अक्सर पीड़ितों को ही चुप कराने की कोशिश करता है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक अब्यूजर (शोषण करने वाला) को सिस्टम और समाज अनजाने में बढ़ावा देते हैं। संध्या का किरदार उन महिलाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो चुप्पी तोड़कर बोलना सीख रही हैं।

फिल्म के कुछ दृश्य काफी प्रभावशाली हैं, खासकर जब संध्या अपने परिवार के बीच अपनी आवाज उठाती है। यह फिल्म ‘परफेक्ट विक्टिम’ की अवधारणा पर सवाल उठाती है और बताती है कि समाज उत्तरजीवियों (survivors) से किस तरह की उम्मीदें रखता है।

पटकथा में कुछ खामियां और ‘सुविधा की राजनीति’

Cheekatilo Movie Review में अगर कमियों की बात करें, तो पटकथा कई जगह ‘लॉ ऑफ कन्वीनिएंस’ यानी सुविधा के सिद्धांत पर चलती दिखती है। कई बार ऐसा लगता है कि कहानी को आगे बढ़ाने के लिए घटनाएं बहुत ही आसानी से घट रही हैं। उदाहरण के लिए, एक आम पॉडकास्टर को पुलिस जांच में इतनी आसानी से शामिल होने देना थोड़ा अव्यावहारिक लगता है।

इसके अलावा, फिल्म का टोन भी कहीं-कहीं भटक जाता है। जहां एक तरफ फिल्म संवेदनशीलता की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ कुछ डायलॉग्स और सीन ऐसे हैं जो थोड़े विरोधाभासी लगते हैं। एक दृश्य में एक शक्तिशाली व्यक्ति पुलिस के सामने ही गंभीर धमकी देता है, लेकिन उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती।

अभिनय और तकनीकी पक्ष

शोभिता धुलिपाला ने संध्या के रूप में एक सधा हुआ अभिनय किया है। हालांकि, उनके किरदार को काफी गंभीर और भावहीन (straight-faced) रखा गया है, जिससे कई बार दर्शक उनके दर्द से पूरी तरह जुड़ नहीं पाते। अन्य कलाकारों में झांसी, आमनी और रविंद्र विजय ने अपने किरदारों के साथ न्याय किया है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और सिनेमैटोग्राफी कहानी के डार्क टोन को सपोर्ट करते हैं, लेकिन कुछ जगहों पर ‘ऐगिरी नंदिनी’ जैसे क्लासिकल ट्रैक का इस्तेमाल घिसा-पिटा महसूस होता है।

The suspense and thriller scenes of the film Cheekatilo

क्या आपको यह फिल्म देखनी चाहिए?

‘चीकटिलो’ एक अच्छी शुरुआत है जो उन विषयों पर बात करती है जिन्हें अक्सर कालीन के नीचे दबा दिया जाता है। यदि आप क्राइम थ्रिलर पसंद करते हैं और सामाजिक संदेश वाली फिल्में देखना चाहते हैं, तो इसे एक बार देखा जा सकता है। लेकिन अगर आप एक बहुत ही बारीक और बिना किसी खामी वाली थ्रिलर की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह आपको थोड़ी निराश कर सकती है।

फिल्म का अंत संध्या के लिए एक क्लोजर की तरह है, जहां वह अपनी खोई हुई गरिमा और सुरक्षा को वापस पाती है। हालांकि, फिल्म यह भी याद दिलाती है कि असल जिंदगी में हर किसी को ऐसा मौका नहीं मिलता।

निष्कर्ष: उपलब्ध विवरणों और समीक्षाओं के आधार पर, ‘Cheekatilo’ एक साहसी प्रयास है जो समाज को आईना दिखाने की कोशिश करता है, भले ही इसके कुछ हिस्से थोड़े कमजोर हों। यह प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही है।

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