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Chandra Pratap Tiwari | विंध्यप्रदेश के प्रथम नेता प्रतिपक्ष चंद्रप्रताप तिवारी की कहानी

Chandra Pratap Tiwari addressing the assembly during a legislative debateChandra Pratap Tiwari addressing the assembly during a legislative debate

Chandra Pratap Tiwari Ki Kahani: विंध्यप्रदेश के पहले नेता प्रतिपक्ष, सर्वोदयी चंद्रप्रताप तिवारी की। जिन्होंने न सत्ता की लालसा की, न वैभव का मोह पाला। उन्होंने अपना समूचा जीवन समाजवादी विचारधारा, जनसेवा और संघर्ष को समर्पित कर दिया। विंध्य भूमि के सीधी जिले जैसे भूभाग से उठकर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन, लोकतांत्रिक चेतना और जनआकांक्षाओं की लड़ाई को पूरी नैतिक दृढ़ता और वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ाया।

किसान परिवार में हुआ था जन्म

चंद्रप्रताप तिवारी का जन्म 25 दिसंबर 1920 को रीवा राज्य के चुरहट इलाके के बेलदह गाँव में एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। वह बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे, परिणामस्वरूप राज्य की तरफ से मिलने वाली मेधावी छात्रवृत्ति के कारण वह रीवा में आगे की पढ़ाई के लिए आ गए, जो उस समय क्षेत्र में राजनैतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था।

भारत छोड़ो आंदोलन और छात्र विद्रोह

वर्ष 1942 में, जब चंद्रप्रताप तिवारी रीवा के दरबार इंटरमीडियट कॉलेज में अध्ययनरत थे। तभी महात्मा गांधी ने “करो और मरो” का आह्वान करते हुए भारत छोड़ो आंदोलन का शंखनाद किया। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बाद स्वतंत्रता आंदोलन की जिम्मेदारी अब युवाओं पर आ गई। विंध्य क्षेत्र के छात्र भी इस उफान से अछूते नहीं रहे। सीमित साधनों के बावजूद देशभक्ति और विद्रोह का ज्वार उनके मन में उमड़ पड़ा। दरबार कॉलेज में पढ़ने वाले चंद्रप्रताप तिवारी समेत ग्यारह छात्रों ने मिलकर एक संघर्ष समिति बना। प्रारंभ में तो आंदोलन शांत रहा, किंतु इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शहीद पद्मधर सिंह के बलिदान की खबर ने इसे उग्र बना दिया। छात्रों ने साहसिक कदम उठाते हुए कॉलेज परिसर से यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहरा दिया। यह क्षण गर्व का था, पर सत्ता के लिए खुली चुनौती।

भूमिगत हो गए चंद्रप्रताप तिवारी

शीघ्र ही आंदोलनकारियों पर गिरफ्तारी वारंट जारी हुए। कुछ छात्र पकड़े गए, कुछ भूमिगत हुए। तिवारी जी ने गिरफ्तारी से बचते हुए रानीतालाब और चिरहुला के खेतों में शरण ली और बाद में लगभग 45 किलोमीटर पैदल चलकर कठिनाइयों को पार करते हुए अपने गाँव पहुँचे। लेकिन आंदोलन की गति मंद पड़ने और कॉलेज पुनः खुलने पर प्राचार्य अंबाप्रसाद माथुर के समझाने के बाद वे पुनः दरबार कॉलेज लौट आए।

इलाहाबाद और लखनऊ में प्राप्त की उच्च शिक्षा

दरबार कॉलेज से इंटरमीडियट के बाद चंद्रप्रताप तिवारी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बी.ए. किया और फिर लखनऊ विश्वविद्यालय में एकसाथ एम.ए. व एल.एल.बी. में प्रवेश लेकर बटलर हॉस्टल में रहने लगे। लखनऊ में ही वे कांग्रेस के संपर्क में आए, विधिवत सदस्य बने और चरखा चलाकर सूत कातना भी सीखा।

लोहिया का प्रभाव

यहाँ हॉस्टल में रहते समय ही 1945-46 में डॉ. राममनोहर लोहिया की एक सभा हुई, जिसमें बड़ी संख्या में हरिजन उपस्थित थे। सभा में लोहिया जी ने कहा- हम आज भी इन्हें तुम कहते हैं, जबकि इन्हें आप कहना चाहिए, इसमें कठिनाई क्या है? लोहिया के ये शब्द तिवारी जी के मर्म को भेद गए और यहीं से उनके विचारों पर सोशलिस्ट प्रभाव की नींव पड़ी।

ग्रेजुएट्स संगठन का निर्माण

जब वह लौटकर रीवा आए तो स्कालरशिप में मेरिट प्राप्त और एम. ए. की डिग्री होने के बाद भी उनका सलेक्शन बतौर नायाब तहसीलदार नहीं हुआ, जबकि उनसे कमजोर और थर्ड डिग्री पास उम्मीदवार का सलेक्शन हो गया क्योंकि वह रियासत के किसी सरदार के रिश्तेदार थे, तिवारी जी को यह बात नागवार गुजरी। उन्होंने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर ‘ग्रेजुएट्स संगठन’ बनाया और रीवा राज्य में सरकारी नौकरी के लिए होने वाले भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाने लगे।

सीधी में किसानों के लिए आंदोलन

इसके साथ ही उन्होंने सीधी में वकालत भी प्रारंभ कर दी और किसानों की बेदखली और उनके साथ होने वाले भेदभावों के विरुद्ध आंदोलनरत हो गए, जिसके बाद उन्हें आठ बार जेल जाना पड़ा। लेकिन वह अपने सोशलिस्ट साथी बड़खड़ा के जगतबहादुर सिंह बघेल और कपुरी के ठाकुर छोटेलाल सिंह बघेल के साथ मिलकर, लगातार किसानों के बेदखली के विरुद्ध चुरहट-सीधी-मड़वास क्षेत्र में संघर्षरत और सक्रिय रहे। उन्होंने लगातार अपने साथियों के साथ पूरे जिले भर में पदयात्राएं की, परिणामस्वरूप किसान और मजदूर सोशलिस्ट दलों से जुड़ता गया और इसी का परिणाम आगे चुनावों में मिलने वाला था, जब सीधी जिला कांग्रेस विहीन हो गया था।

जब सीधी जिले में शून्य पर आउट हुई कांग्रेस

दरसल 1952 के प्रथम आम चुनावों की घोषणा हो गई, साठ सदस्यीय विधानसभा में सोशलिस्ट पार्टी ने 46 सीटों में अपने उम्मीदवार उतारे और 11 सीटों में उन्हें विजय प्राप्त हुई, चंद्रप्रताप तिवारी की कर्मभूमि सीधी में सोशलिस्टों को सबसे ज्यादा सफलता मिली थी, सात विधानसभा वाले सीधी जिले में कांग्रेस को बड़ी शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा था, जब वह कोई भी विधानसभा सीट नहीं जीत पाई थी, सात में से छः सोशलिस्टों ने और एक देवसर सीट जनसंघ ने जीती थी। तिवारी जी सीधी विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए थे। यहाँ तक की सीधी लोकसभा सीट में सोशलिस्ट पार्टी से भगवानदत्त शास्त्री सांसद निर्वाचित हुए थे।

विंध्यप्रदेश के प्रथम नेता प्रतिपक्ष

खैर विंध्य की प्रथम विधानसभा में सबसे बड़ी विपक्षी दल होने के नाते, नेता प्रतिपक्ष का पद सोशलिस्ट को ही मिला और वरिष्ठतम होने के नाते चंद्रप्रताप तिवारी नेता प्रतिपक्ष बने। और फिर विंध्य की विधानसभा सोशलिस्टों के प्रश्नों और स्वरों से गूंज उठी।

डेवढ़ा लगान का जमकर विरोध

विंध्य प्रदेश की विधानसभा में किसानों पर डेवढ़ा अर्थात डेढ़ गुना लगान लागू करने का प्रस्ताव पारित कर दिया गया। चूँकि विंध्यप्रदेश में उस समय कांग्रेस बहुमत की सरकार थी, इसीलिए प्रस्ताव विधानसभा से पास भी हो गया। पर विंध्य उस समय पार्ट-सी स्टेट था, मने केंद्रशासित प्रदेश। इसलिए किसी भी विधेयक को अधिनियम का रूप लेने से पहले राष्ट्रपति की स्वीकृति आवश्यक थी। इस कठोर लगान के विरोध में चंद्रप्रताप तिवारी जी के नेतृत्व में सोशलिस्टों ने निर्णय लिया कि दिल्ली जाकर राष्ट्रपति से भेंट कर इस बिल पर हस्ताक्षर न करने की विनती की जाए। रीवा से तिवारी जी के नेतृत्व में चौदह सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल दिल्ली पहुँचा, पर वहाँ राष्ट्रपति से मिलने की अनुमति नहीं मिली। उन्हें राज्य मामलों के मंत्री से मिलने के लिए कहा गया। यह व्यवहार तिवारी जी को अत्यंत नागवार गुजरा।

राष्ट्रपति से मिलने के लिए राजघाट में किया सत्याग्रह

गांधी जी के देश में इस तरह का अपमानजनक व्यवहार, यह बात तिवारी जी को स्वीकार नहीं हुई। उन्होंने वहीं निर्णय लिया कि राजघाट पर आमरण अनशन करेंगे और साथ आए साथियों को आंदोलन के प्रचार-प्रसार में लग जाने को कहा। परंतु यमुना प्रसाद शास्त्री जी भी उनके साथ अनशन पर बैठने को तैयार हो गए। अगले दिन, राजघाट में गांधी जी की समाधि के समीप, तिवारी जी और शास्त्री जी शांतिपूर्वक अनशन पर बैठ गए। यह सत्याग्रह पूर्णतः शांतिपूर्ण था, किंतु दिल्ली के कई अख़बारों ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया। मीडिया में यह खबर फैलते ही, राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सोशलिस्ट नेता अशोक मेहता को तिवारी जी से बातचीत के लिए भेजा। परंतु जिद्दी और सिद्धांतनिष्ठ तिवारी जी नहीं माने। मीडिया कवरेज और दिल्ली के कुछ जनसाधारण की सहानुभूति बढ़ने के बाद तिवारी जी और शास्त्री जी को गिरफ्तार कर गाज़ियाबाद भेज दिया गया। परंतु वहाँ स्थानीय जनता के समर्थन और दबाव के कारण दोनों को पुनः छोड़ दिया गया। इस बीच दिल्ली और आसपास के किसानों ने भी इस आंदोलन का समर्थन करना शुरू कर दिया। बढ़ते जनसमर्थन को देखते हुए, सुचेता कृपलानी एक पत्र लेकर आईं, राष्ट्रपति महोदय ने मुलाकात का समय दे दिया था। आश्वासन मिलते ही तिवारी जी और शास्त्री जी ने अपना आमरण अनशन समाप्त किया। तीन दिन बाद राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद और तिवारी जी के नेतृत्व वाले प्रतिनिधि मंडल की भेंट हुई। राष्ट्रपति ने उन्हें उचित आश्वासन दिया। इस प्रकार चंद्रप्रताप तिवारी जी ने विंध्य के किसानों की आवाज दिल्ली तक पहुँचाई और डेवढ़ा लगान के विरुद्ध संघर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित किया।

गोवा मुक्ति आंदोलन में लिया भाग

इधर इसी समय सोशलिस्ट गुट का भी बंटवारा हो गया और तिवारी जी शास्त्री जी के साथ लोहिया गुट में चले गए। फिर आया वर्ष 1955 जब लोहिया के नेतृत्व में सोशलिस्टों ने गोवा मुक्ति आंदोलन छेड़ा था, लोहिया पहले ही गोवा में अनाधिकृत प्रवेश के बाद गिरफ्तार हो चुके थे। जिसके बाद समाजवादियों ने पुर्तगालियों के विरुद्ध 15 अगस्त को चारों दिशाओं से प्रवेश करने की योजना बनाई। चंद्रप्रताप तिवारी ने गोवा मुक्ति आंदोलन में भाग लेने का फैसला किया और उनके नेतृत्व में विंध्य से 19 सदस्यीय प्रतिनिधि दल बेलगाम पहुंचा, जिसमें यमुना प्रसाद शास्त्री भी थे। 15 अगस्त 1955 के दिन तिवारी जी ने अपने दल के साथ गोवा में प्रवेश की कोशिश की, पुर्तगाली पुलिस की लाठी और गोली के बिना परवाह किए यह दल बहुत आगे तक गया लेकिन पणजी नहीं पहुँच पाया, बाद में एक सर्वदलीय बैठक के बाद गोवा आंदोलन को स्थगित कर दिया गया। ससोली के रास्ते गोवा में प्रवेश के समय की घटना का जिक्र चंद्रप्रताप तिवारी ने अपनी आत्मकथानात्मक किताब- “नासमझी के चालीस वर्ष” में विस्तार से किया है।

मध्यप्रदेश के नेता प्रतिपक्ष

इधर केंद्रीय सरकार ने राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के पर विंध्यप्रदेश को नए मध्यप्रदेश के साथ मिलाने का फैसला किया, जिसका सोशलिस्टों ने जमकर विरोध किया, लेकिन अंततः सरकार ने विंध्यप्रदेश को समेत चार राज्यों को मिलाकर नए मध्यप्रदेश का निर्माण कर ही दिया। इस नए बने मध्यप्रदेश में 1957 में विधानसभा चुनाव हुए और कुल 320 विधानसभा सीट वाले इस राज्य में कांग्रेस के बहुमत की सरकार बनी। लेकिन यहाँ पर भी सोशलिस्ट सबसे बड़े विपक्षी के तौर पर उभरे, चंद्रप्रताप तिवारी दुबारा प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर सीधी विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए, यह तिवारी जी का राजनैतिक संघर्ष और प्रभाव ही था, कि उनको पूरे मध्यप्रदेश के सोशलिस्टों ने अपना नेता चुना और वह मध्यप्रदेश विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष बने।

सीधी जिले में कांग्रेस का खराब प्रदर्शन

गौर करने वाली बात है पूरे विंध्य में इस बार प्रजा सोशलिस्ट थोड़ा कमजोर हुई थी, लेकिन सीधी जिले में प्रसोपा मजबूत ही थी, उसने सीधी और देवसर दो सीटों पर विजय प्राप्त की थी, जबकि बाकि दो सीटों में निर्दलियों ने जीत प्राप्त की थी, कांग्रेस फिर से सीधी जिले में शून्य पर आउट हो चुकी थी, जबकि विंध्य में उसे बड़ी जीत मिली थी, इसीलिए उसने सीधी जिले के मझौली से निर्दलीय विधायक चुने गए अर्जुन सिंह को अपने पक्ष में लाने का प्रयास प्रारंभ कर दिया और फिर आगे हम सब जानते हैं कि इतिहास बन गया।

1962 के युद्धकाल में चंद्रप्रताप तिवारी

आगे चलकर चंद्रप्रताप तिवारी वर्ष 1962 में पुनः प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर सीधी विधानसभा से ही विधायक निर्वाचित हुए। ठीक इसी समय देशभर में युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। भारत-चीन संबंध बेहद तनावपूर्ण थे और हालात किसी भी क्षण युद्ध में बदल सकते थे। चीन सीमा के कई हिस्सों में भारतीय भू-सीमा के भीतर तक आक्रामक रूप से घुस आया था। देश के केंद्रीय नेतृत्व की राजनीतिक इच्छाशक्ति उस समय कुछ कमजोर पड़ती दिख रही थी, और दूसरी ओर हमारी सेना संसाधनों के भारी अभाव से जूझ रही थी। ऐसे संकट के क्षणों में पूरा देश एक भाव से सेना के समर्थन में खड़ा होने लगा। लोग स्वेच्छा से सोना, नकद, कंबल, तांबे के बर्तन, कपड़े, जो भी संभव हो, दान कर रहे थे। राष्ट्रप्रेम की एक अद्भुत लहर पूरे भारत में उठ खड़ी हुई थी, जिसकी झलक उन्हें दमोह में हुई एक जनसभा में भी दिखी। जिसके बाद चंद्रप्रताप तिवारी के मन में यह भाव उत्पन्न हुआ कि सीधी जिला भी इस राष्ट्रीय संकट में अपना सार्थक योगदान दे। उन्हें लगा कि यहाँ के लोग अभी भी अपेक्षाकृत शांत हैं इसीलिए यहाँ के जनप्रतिनिधि होने के नाते, यह भाव जगाना उन्हीं का कर्तव्य है।

सरकार को सौंपा सम्पूर्ण समर्पण पत्र

यही सोचकर वे मध्यप्रदेश के तात्कालिक मुख्यमंत्री भगवंतराव मंडलोई से मिले और उन्हें अपना ‘संपूर्ण समर्पण पत्र’ सौंप दिया। इसके बाद जब वे सीधी लौटे, तो एक विशाल सार्वजनिक सभा आयोजित की गई। उस सभा में स्वयं जिले के कलेक्टर भी उपस्थित थे। सभा में चंद्रप्रताप तिवारी ने जनता के सामने अपना घोषणापत्र पढ़ते हुए बताया कि वे अपनी समस्त व्यक्तिगत संपत्ति की सूची प्रशासन को सौंप रहे हैं, और देशहित में सरकार उसमें से जितना आवश्यक समझें, ले सकते हैं। उन्होंने अपने विधायक वेतन का 50 प्रतिशत राष्ट्ररक्षा के लिए देने की भी घोंषणा की। इसके साथ ही उन्होंने कहा- सरकार चाहे तो स्वयं उन्हें या उनके पुत्र को किसी भी रूप में देशसेवा में ले सकती है, और सबसे भावनात्मक क्षण तब आया, जब उन्होंने अपनी पत्नी की अनुमति से उनके सुहाग चिन्ह भी देश को समर्पित कर दिए। यह घटना केवल त्याग की नहीं, बल्कि उस दौर के वास्तविक राष्ट्रधर्म और कर्तव्यभाव का प्रतीक है, जहाँ एक जनप्रतिनिधि ने न सिर्फ जनता को प्रेरित किया, बल्कि स्वयं उदाहरण बनकर दिखाया कि विपत्ति के समय राष्ट्रहित सर्वोपरि होता है।

अर्जुन सिंह और उनके परिवार से मतभेद

इसे नियति का चक्र ही कहा जाएगा कि चंद्रप्रताप तिवारी का अवसान और अर्जुन सिंह का उत्थान लगभग एक ही समय में हुआ था। विंध्य और मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दोनों के बीच रही अदावत आज भी याद की जाती है। चंद्रप्रताप तिवारी अर्जुन सिंह भी पहले उनके पिता चुरहट के रावसाहब और रीवा राज्य के सर्वाधिक ताकतवर व्यक्तियों में से एक राजा शिवबहादुर सिंह से भी टकरा चुके थे, जब उन्होंने चुरहट इलाके में किसानों की बेदखली का मुद्दा बड़े जोर-शोर से उठाया था। चंद्रप्रताप तिवारी अपनी किताब में लिखते हैं- “जब द्वारिका प्रसाद मिश्र मुख्यमंत्री बने, तो मैंने उन्हें अर्जुन सिंह को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करने का आग्रह किया। कारण यह था कि नेहरू से अनबन के चलते डी.पी. मिश्र कुछ समय प्रसोपा में भी रहे थे और उसी कारण से मेरा उन पर प्रभाव था, अर्जुन सिंह में मैं उनके पिता से अलग एक होनहार, उज्ज्वल भविष्य वाला नेता देखता था।” लेकिन मंत्री बनते ही उनके तेवर बदलने लगे। व्यवहार में अदावत स्पष्ट तौर पर आ गई। वह आगे लिखते हैं, विधानसभा में एक तीखी बहस के दौरान उन्होंने अर्जुन सिंह को कहीं से भी चुनाव लड़ने की चुनौती दे दी।

चुरहट से अर्जुन सिंह की पराजय

वर्ष 1967 मध्यप्रदेश की राजनीति में निर्णायक मोड़ लेकर आया। इस चुनाव में चंद्रप्रताप तिवारी ने अपनी पारंपरिक सीधी सीट छोड़कर चुरहट से चुनाव लड़ा और इतिहास रचते हुए कुंवर अर्जुन सिंह को पराजित कर दिया। अर्जुन सिंह की हार विधानसभा में सबसे अधिक मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्र को खल रही थी। इसी कारण रीवा के महाराज मार्तंड सिंह के सहयोग से उमारिया विधायक रणविजय प्रताप सिंह का इस्तीफा दिलवाकर अर्जुन सिंह को पुनः विधानसभा में लाए और पुनः अपने मंत्रिमंडल में लाए। इस घटनाक्रम के बाद तिवारी जी और मिश्र के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए। तिवारी जी अपनी किताब में लिखते हैं- मैंने उन्हें स्पष्ट चुनौती दी कि आप अधिक समय तक मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे। और वही हुआ, जब मिश्र सरकार गिर गई और राजमाता विजयाराजे सिंधिया के नेतृत्व में कांग्रेस के बागी विधायकों, सोशलिस्टों के सहयोग से गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में संविद सरकार बनी। किन्तु सत्ता परिवर्तन के बावजूद चंद्रप्रताप तिवारी के तेवर नहीं बदले। वे नए मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह से भी सदन में लगातार जनमुद्दों पर टकराते रहे।

कांग्रेस में चले गए चंद्रप्रताप तिवारी

लेकिन वक्त बदला, 1968 में सोशलिस्टों का एक धड़ा अशोक मेहता के नेतृत्व में कांग्रेस में चला गया और इनके साथ चंद्रप्रताप तिवारी भी कांग्रेस में चले गए, जैसे कि हमने पहले भी कई बार यह बताया है, कि इंदिरा गांधी पर तब सोशलिस्ट प्रभाव था, कारण पार्टी में उनके उदय के समय बुजुर्ग सिंडिकेट्स नेताओं का उन्हें भारी विरोध सहना पड़ रहा था, तब उनका स्वाभाविक झुकाव सोशलिस्ट धड़ों की तरफ हो गया था, और कांग्रेस में सोशलिस्टों का प्रभाव उस समय इंदिरा गांधी के नीतिगत फैसलों पर भी दृष्टिगत होता था। जिसके कारण कई पुराने सोशलिस्ट नेता अब कांग्रेस की तरफ जा रहे थे।

वनमंत्री के तौर पर बिरला को नोटिस

1972 में चंद्रप्रताप तिवारी कांग्रेस की टिकट पर फिर से चुरहट विधानसभा से निर्वाचित हुए, और प्रकाशचंद्र सेठी के मंत्रीमंडल में वनमंत्री के तौर पर शामिल हो गए, इसी सरकार में अर्जुन सिंह भी बतौर शिक्षा मंत्री शामिल थे। लेकिन चंद्रप्रताप तिवारी का बगावती तेवर यहाँ भी बरकरार रहा, जब उन्होंने बतौर वनमंत्री बिड़ला ग्रुप को भी नोटिस थमा दिया, जिसके बाद देशभर में हंगामा मच गया। दरसल हुआ यह था कि बिड़ला के ओपीएम पेपर मिल द्वारा दी जाने वाली बांस रॉयल्टी पर उन्होंने सवाल उठाए और संतोषजनक उत्तर ना मिलने के बाद उन्होंने बिरला को नोटिस थमा दिया। बिरला ग्रुप इंदिरा गांधी का भी खास था, राजनैतिक पार्टियों को चंदा भी देता था और भी कई बातें रही होंगी, लेकिन उन्होंने इस मामले में इंदिरा गांधी की भी नहीं सुनी। उन्हें कई बार समझाने की भी कोशिश की गई, लेकिन उनके बगावती तेवर आगे भी जारी ही रहे।

जेपी आंदोलन में सक्रियता

जब 1974 में सर्वोदयी जयप्रकाश नारायण ने इंदिरा गांधी के विरुद्ध मोर्चा खोल रखा था और वर्षों बाद पुनः सक्रिय हुए थे, चंद्रप्रताप तिवारी उस समय मध्यप्रदेश के योजना और विकास मंत्री थे, लेकिन कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस नेता होने के बाद भी वह जेपी से मिलते थे, उनकी कुछ बैठकों में भी हिस्सा लिया, परिणामस्वरूप जो होना था, वह मंत्री पद से हटा दिए गए। लेकिन इसके साथ ही राजनीति से उनका मोह भी भंग हो गया, शायद वह देश की छल-प्रपंच की राजनीति से तंग आ चुके थे, उन्होंने एक विचारधारा को जिया था और पूरा जीवन उसी के लिए समर्पित भी थे।

राजनीति छोड़कर सर्वोदयी हुए चंद्रप्रताप तिवारी

राजनीति से मोह भंग हुआ तो वह सर्वोदयी हो गए, झोला उठाया और पूरा देश नापने लगे, जेपी से तो जुड़े ही थे, विनोबा भावे के सामाजिक कार्य रूपी यज्ञ में भी भागीदार हो गए। जब असम तड़प रहा था, पंजाब जल रहा था तो तिवारी जी वहाँ घूम रहे थे, लोगों की पीड़ा और दर्द को महसूस कर रहे थे। तिवारी जी टूट गए लेकिन कभी झुके नहीं, अपनी विचारधारा से कभी हटे नहीं, जीवनभर आमजन और गरीबों के हित की बात वह सोचते रहे, उनके बेहतरी के प्रयास करते रहे, सादगी इतनी थी, की विधायक और मंत्री होने के बाद भी उनके पास कोई गाड़ी नहीं थी, वह हमेशा सीधी से रीवा लॉरी अर्थात बस में ही बैठकर आते थे।

पूरा जीवन सिद्धांतों को जिया

पूरे जीवनभर चंद्रप्रताप तिवारी एक ही मूल प्रश्न के साथ संघर्षरत रहे-“क्या राजनीति सचमुच आम आदमी के पक्ष पर खड़ी है या भविष्य में खड़ी हो सकती है? और जब उन्हें लगा कि सत्ता के गलियारों में इस प्रश्न का उत्तर धुंधला पड़ रहा है, तब उन्होंने चुनावी राजनीति को त्याग दिया और सर्वोदयी हो गए। सत्ता लोभ तो उन्हें वैसे भी कभी नहीं था, नहीं तो जब सत्ता के दरवाजे उनके लिए खुले थे, तब वह इतने कठोर और कड़े फैसले नहीं करते। यही कारण है कि उनका जीवन केवल एक राजनेता की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के नैतिक संघर्ष का एक जीवंत दस्तावेज है।

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