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भारत Chabahar Port ईरान को वापस सौंप क्यों रहा?

भारत जल्द ही ईरान के Chabahar Port में अपनी हिस्सेदारी (Chabahar Port Stake Transfer) अस्थायी तौर पर ईरानी कंपनी को सौंप सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह फैसला इसलिए लिया जा रहा है ताकि अमेरिकी प्रतिबंध (US Sanctions) से मिली छूट खत्म होने के बाद भी प्रोजेक्ट बिना रुकावट जारी रह सके।

भारत ने इस पोर्ट में करीब ₹1100 करोड़ का निवेश (Chabahar Port India Investment) किया है और फिलहाल United States और Iran दोनों के साथ अलग-अलग स्तर पर बातचीत जारी है।

अस्थायी ट्रांसफर, बाहर नहीं होगा भारत

रिपोर्ट साफ करती है कि India इस प्रोजेक्ट से बाहर नहीं निकल रहा, बल्कि यह सिर्फ एक अस्थायी व्यवस्था होगी। भविष्य में भारत यहां कनेक्टिविटी बढ़ाने की योजना पर काम जारी रखेगा, जिसमें रेल लिंक भी शामिल है।

यह कदम अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

रणनीतिक लोकेशन से बढ़ती अहमियत

Chabahar Port होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के पास स्थित है, जो Persian Gulf को अरब सागर से जोड़ता है। इसकी लोकेशन इसे बेहद रणनीतिक बनाती है।

यह पोर्ट भारत को पाकिस्तान को बायपास कर सीधे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का रास्ता देता है।

चीन-पाकिस्तान के खिलाफ रणनीतिक जवाब

इस प्रोजेक्ट को China और Pakistan के ग्वादर पोर्ट (Gwadar Port Project) के जवाब के तौर पर भी देखा जाता है। चाबहार भारत के लिए क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने का एक बड़ा जरिया है।

चाबहार प्रोजेक्ट: अब तक का सफर

भारत और ईरान के बीच इस प्रोजेक्ट की शुरुआत Atal Bihari Vajpayee सरकार के समय 2003 में हुई थी। बाद में Manmohan Singh ने 2013 में करीब ₹800 करोड़ निवेश की घोषणा की। 2016 में Narendra Modi ने ईरान और अफगानिस्तान के साथ त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसमें पोर्ट डेवलपमेंट और टर्मिनल निर्माण के लिए बड़े निवेश का फैसला लिया गया।

भारत को क्या फायदे?

चाबहार पोर्ट से भारत को कई बड़े फायदे मिलते हैं।
सबसे अहम यह कि भारत को अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया तक पहुंचने के लिए पाकिस्तान के रास्ते पर निर्भर नहीं रहना पड़ता (Bypass Pakistan Route)। इसके जरिए भारत अपने फूड, दवाइयां और इंडस्ट्रियल सामान आसानी से भेज सकता है, जिससे व्यापार और एक्सपोर्ट बढ़ता है। साथ ही, यह पोर्ट भारत को चीन-पाकिस्तान गठजोड़ के मुकाबले मजबूत रणनीतिक स्थिति देता है।

आगे क्या?

फिलहाल भारत की प्राथमिकता यही है कि प्रोजेक्ट चलता रहे और उसका निवेश सुरक्षित रहे। ऐसे में यह अस्थायी हिस्सेदारी ट्रांसफर एक ‘प्रैक्टिकल मूव’ माना जा रहा है, जिससे भारत अपनी रणनीतिक पकड़ भी बनाए रखे और अंतरराष्ट्रीय दबाव को भी मैनेज कर सके।

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