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क्या भारत को चाबहार पोर्ट छोड़ना पड़ेगा? ईरान की सड़कों पर आग और अमेरिकी दबाव ने बढ़ाई टेंशन

Chabahar Port Hindi News: ईरान में सुलगती सड़कों और राजनीतिक उथल-पुथल ने भारत की सबसे महत्वाकांक्षी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी परियोजना – चाबहार पोर्ट (Chabahar Port) – को अनिश्चितता के घेरे में ला दिया है। लगभग 500 मिलियन डॉलर (करीब 4,200 करोड़ रुपये) का यह रणनीतिक निवेश अब सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं रहा – यह भारत की कनेक्ट सेंट्रल एशिया (Connect Central Asia) रणनीति और पाकिस्तान-चीन प्रभाव को बैलेंस करने की सबसे बड़ी कड़ी है। लेकिन ईरान में सत्ता परिवर्तन की आशंका और अमेरिकी दबाव ने भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

खतरे में चाबहार

ईरान की अस्थिरता चाबहार के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। कोई भी लंबी अवधि की इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना उस देश की स्थिरता और सरकार की निर्णय क्षमता पर टिकी होती है। ईरान में जारी विरोध-प्रदर्शन और राजनीतिक संकट से यह जोखिम बढ़ गया है कि चाबहार जैसी परियोजनाएं या तो रुक सकती हैं या पूरी तरह ठप पड़ सकती हैं। यदि सत्ता परिवर्तन अव्यवस्थित हुआ तो सुरक्षा गारंटी, सीमा शुल्क समझौते और ट्रांजिट नियम लागू करना लगभग असंभव हो जाएगा।

आर्थिक और कूटनीतिक दबाव

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ (Additional Tariff) लगाया जा सकता है। यह सेकंडरी सैंक्शंस (Secondary Sanctions) का नया और कठोर रूप है। भारत के लिए यह दोहरी मार है – एक तरफ ईरान के साथ रणनीतिक साझेदारी बरकरार रखनी है, दूसरी तरफ अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंधों को बचाना है। भारतीय बैंक, बीमा कंपनियां और शिपिंग लाइनें पहले से ही ईरान से जुड़े लेनदेन को लेकर सतर्क हैं।

चीन की चाबहार पर नज़र

बीजिंग की नजरें भी चाबहार पर टिकी हैं। रणनीति की पुरानी कहावत है कि सत्ता कभी खालीपन बर्दाश्त नहीं करती। यदि भारत किसी कारण से पीछे हटता है तो चीन (China) इस जगह को भरने के लिए पूरी तरह तैयार है। चीन पहले से ही ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और तेल खरीदार है। 2021 के 25-वर्षीय चीन-ईरान समझौते के तहत बीजिंग ने ऊर्जा और बंदरगाह क्षेत्र में $400 अरब के निवेश का रोडमैप तैयार किया है। यदि भारत चाबहार में सक्रियता कम करता है तो चीन इसे ग्वादर (Gwadar) के साथ जोड़कर क्षेत्रीय समुद्री कनेक्टिविटी पर अपना दबदबा स्थापित कर सकता है – जो भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से बड़ा खतरा होगा।

क्या ईरान में सत्ता परिवर्तन भारत के लिए फायदेमंद होगा?

कई लोग तर्क देते हैं कि कट्टरपंथी शासन का अंत भारत के हित में होगा, लेकिन रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना उल्टा है। भारत के लिए ईरान में विचारधारा से ज्यादा महत्वपूर्ण स्थिरता है। नई दिल्ली ने मौजूदा व्यवस्था के साथ एक व्यावहारिक तरीका विकसित कर लिया है। खंडित या गृहयुद्ध से जूझता ईरान न केवल चाबहार को डूबा देगा, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया में कट्टरपंथ और अस्थिरता फैलाएगा – जिसका असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और वहां रह रहे 80 लाख भारतीय प्रवासियों पर सीधा पड़ेगा।

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