Bundelkhand Alha-Udal Jagannik : जनता के कंठ में गूंजता वीर रस का अमर महाकाव्य है-बुंदेलखंडी आल्हा

Bundelkhand Alha-Udal Jagannik : जनता के कंठ में गूंजता वीर रस का अमर महाकाव्य है-बुंदेलखंडी आल्हा-“बारह बरस लै कूकर जिए…जैसी पंक्तियों सहित “इस लेख में जानिए की क्या है आल्हाखंड और क्यों है रामचरितमानस के बाद सबसे लोकप्रिय लोककाव्य है, साथ ही वीरता का काव्य जो ,लोकसंस्कृति का हिस्सा भी है। उत्तर भारत के गांव-गांव में घनघोर वर्षा के दिनों में जब ढोल की गम्भीर थाप और हुंकार भरी आवाज़ गूंजती है “बारह बरिस लै कूकर जीऐं, औ तेरह लौ जिऐं सियार…”तो समझ लीजिए आल्हाखंड का पाठ शुरू हो गया है। यह कोई साधारण गीत नहीं बल्कि भारतीय लोकसाहित्य का एक अद्वितीय वीर रस प्रधान महाकाव्य है, जो सदियों से जनता के कंठ में जीवित है। जगनिक द्वारा रचित यह काव्य आल्हा और ऊदल नामक दो वीरों की 52 लड़ाइयों का रोमांचकारी वर्णन है जो परमाल रासो का एक खंड माना जाता है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विकास यात्रा

आल्हाखंड का मूल रचयिता कालिंजर के राजा परमार के आश्रित कवि जगनिक को माना जाता है। माना जाता है कि इसका मूल रूप तेरहवीं या चौदहवीं शताब्दी में तैयार हुआ था। शताब्दियों तक मौखिक परम्परा में चलने के कारण इसका मूल रूप खो गया है, परन्तु जनता की स्मृति में यह लोकगाथा से विकसित होकर एक लोक महाकाव्य बन गया। आरम्भ में यह एक लघु लोकगाथा (बैलेड) रही होगी, जो कालान्तर में गाथाचक्र (बैलेड साइकिल) और फिर एक पूर्ण लोक महाकाव्य के रूप में परिवर्द्धित हुई।

साहित्यिक विशेषताएं सरलता में समाया ओज

आल्हाखंड की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी सहज, सरल और ओजस्वी शैली है इसमें अलंकृत महाकाव्यों की शैली का प्रभाव नहीं दिखता। न शब्द-चयन में कृत्रिमता, न अलंकारों का भारीपन है, बस एक सरल, स्वाभाविक, सफ़ाई के साथ कथा कहने की प्रवृत्ति परन्तु इस सरलता के पीछे भी छिपा है वीर रस का इतना अदम्य वेग और शक्तिमत्ता कि यह पाठक या श्रोता की नसों में उष्ण रक्त का संचार कर देता है। इसमें वीरता और आत्मोत्सर्ग को इतनी ऊंची भूमि पर प्रस्तुत किया गया है कि यह देश-काल की सीमा लांघकर जन-जन की जीवनधारा में मिल गया है। यही कारण है कि लोकप्रियता की दृष्टि से उत्तर भारत में रामचरितमानस के बाद आल्हाखंड का ही स्थान सर्वश्रेष्ठ है।

आल्हाखंड की लोकप्रियता और प्रसार

आल्हाखंड का प्रचार-प्रसार मुख्यतः मौखिक परम्परा और लोकगायकों (अल्हैत) के माध्यम से हुआ। यह गीत विशेष रूप से वर्षा ऋतु में गाये जाते हैं। बैसवाड़ा इसका केन्द्र माना जाता है, साथ ही बुंदेलखण्ड विशेषकर महोबा के आसपास इसका विशेष चलन है। इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि फर्रुखाबाद के कलेक्टर मि. चार्ल्स इलियट ने सबसे पहले इन गीतों का संग्रह कर प्रकाशित करवाया था।

मूल कथा और प्रमुख संदेश

आल्हाखंड की कथा का प्रारम्भ मांड़ौ की लड़ाई से होता है जहां आल्हा-ऊदल के पिता की हत्या का बदला मात्र 12 वर्ष की आयु में ऊदल लेते हैं। इस महाकाव्य में वीरता, स्वामिभक्ति, भाईचारे, आज्ञाकारिता और बदला लेने जैसे मूल्यों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

कुछ प्रमुख पंक्तियां जो इन मूल्यों को दर्शाती हैं-

वीरता और युद्ध में मरने का महिमा मंडन-“खटिया पर खें जौ मरि जैहौ,बढहै सात साख को नाम-रन में जा खें जौ मर जैहौ, हू- है जुगन-जुगन लौं नाम”

शत्रु से बदला-“जिनके बैरी सम्मुख बैठे उनके जीवन को धिक्कार”

स्वामी व मित्र के लिए त्याग-“जहां पसीना गिरै तुम्हारो तंह दे देऊं रक्त की धार”

पुत्र का महत्व-“जिनके मोड़ा समरथ हुईएं उनका कौन पड़ी परवाह”-प्रस्तुत इन सभी पंक्तियों में पूरी एक गाथा छुपी हुई है जबकि यहां इस पुरे आल्हा खंड की एक-एक लाइन ही प्रस्तुत की है।

ऐतिहासिकता बनाम लोककथा

आल्हाखंड में वर्णित कथा और ऐतिहासिक तथ्यों में अंतर है। इतिहास में चंदेल राजा परमर्दिदेव (परमाल) की कथा भिन्न है, परन्तु आल्हाखंड में राजा परमाल एक वैभवशाली राजा और आल्हा-ऊदल उसके स्वामिभक्त सामंत के रूप में चित्रित हैं। यह प्रबन्ध काव्य अपनी सभी कमजोरियों के बावजूद बुन्देली जनसामान्य को नीति और कर्तव्य का पाठ पढ़ाता है।

निष्कर्ष-लोकजीवन की धड़कन-आल्हाखंड केवल एक साहित्यिक कृति नहीं, बल्कि उत्तर भारत, विशेषकर बुंदेलखण्ड की लोकसंस्कृति की सजीव धड़कन है। यह उस सामूहिक स्मृति का प्रतीक है जो इतिहास को काव्य में ढालकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करती है। जब तक बरसात के दिनों में ढोल की थाप पर अल्हैतों की हुंकार गूंजती रहेगी, तब तक आल्हा और ऊदल का वीरतापूर्ण साहस जनमानस में जीवित रहेगा। जैसा कि लोकोक्ति में कहा गया है-“भरी दुपहरी सरवन गइये,सोरठ गइये आधी रात-आल्हा पवाड़ा वादिन गाइये, जा दिन झड़ी लगे दिन रात”

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