Bihar Election Will Maithili Thakur Step Into Politics : फैंस का डर-मैथिली कहीं इंडियन जेन न बन जाए !हुनर बनाम राजनैतिक जंग – हुनर बनाम राजनीति की जंग – कहीं मैथिली इंडिया की जेन न हो जाए, काश… ये चुनाव मैथिली ये चुनाव हार जाए – ये शब्द सिर्फ एक व्यंग्य नहीं, बल्कि चिंता हैं ,उस कलाकार के लिए, जिसकी आवाज़ में मिट्टी की खुशबू है, जिसकी गायकी में जन-जन की आत्मा बसती है। लेकिन अब वही बच्ची राजनीति के मैदान में उतर चुकी है। सवाल यह नहीं कि वह जीतेंगी या हारेंगी – सवाल यह है कि क्या यह उम्र, यह दिशा, और यह रास्ता सही है ? फिर मात्र 17 साल की लॉटरी विजेता जेन पार्क की कहानी आज मैथिली ठाकुर के लिए चेतावनी बन गई है। क्या कला और राजनीति साथ चल सकते हैं ? पढ़िए एक संवेदनशील विश्लेषण।
जेन पार्क की कहानी – लॉटरी या सज़ा ?
लंदन की जेन पार्क, जिसने मात्र 17 वर्ष की उम्र में 8.4 करोड़ रुपये की लॉटरी जीती थी, उस समय ब्रिटेन की सबसे कम उम्र की लॉटरी विजेता बनीं। दुनिया ने सोचा यह तो सफलता की कहानी है ! पर वक्त ने बताया बल्कि जेन ने यह महसूस किया कि यह इनाम नहीं, इम्तहान था। पैसे आने के बाद दोस्त दूर हो गए, झूठे रिश्ते पास आ गए। जिन्होंने कहा था कि “अब दुनिया तेरे कदमों में है”, वही उसके कदमों से ज़मीन खींच ले गए। जेन ने कहा था ,“मेरे पास सब कुछ है, सिवाय किसी अपने के… काश, मेरे पास ये पैसे न होते।”वो करोड़ों में जीती, पर खुद को हार गई और फिर कहा “किसी कीमत पर किसी बच्ची की मासूमियत की हत्या मत कीजिए।”

जब सुनिधि चौहान ने कहा. ..”कभी-कभी मैं चाहती हूं कि बच्चे न जीतें”
जेन की तरह ही एक और कहानी, सुनिधि चौहान की। सिर्फ 13 साल की उम्र में टीवी शो ‘मेरी आवाज़ सुनो’ जीतकर वे स्टार बन गईं। उसी साल फिल्म ‘शस्त्र’ में गाने का मौका मिला। पर कम उम्र की वह “लॉटरी” सुनिधि के लिए भी भारी पड़ी। कम उम्र में शादी, फिर टूटन सफलता और संघर्ष के बीच की एक उलझन। एक इंटरव्यू में सुनिधि ने कहा था-“कभी-कभी मैं चाहती हूं कि वो बच्चे न जीतें… क्योंकि जीतने के बाद उनकी ज़िंदगी और उनकी मासूमियत दोनों बदल जाते हैं।”
कितनी गहरी बात है,फूल बनने से पहले ही कली तोड़ लेने जैसी।
सुरों की बेटी करेगी सियासती शेर की सवारी
मैथिली ठाकुर एक नाम जो संगीत की मिट्टी से उठा, जिसकी आवाज़ लोक संस्कृति की पहचान बन गई। वो न सिर्फ गाती हैं, बल्कि अपने सुरों में देश की आत्मा को बुनती हैं। लेकिन आज वही बच्ची राजनीति के मंच पर खड़ी है। कानूनी रूप से भले वह बालिग हैं, पर उम्र, अनुभव और दृष्टि के हिसाब से अभी बच्ची ही हैं। लोग कह रहे हैं ,“बेटी, तेरी आवाज़ विधायक के भाषण से कहीं ज्यादा असरदार है।” “तेरी गायकी एक लॉटरी नहीं, वो तो वरदान है।” राजनीति, कला से अलग राह है। यहां सच्चाई से ज्यादा रणनीति चलती है, और जहां रणनीति हावी होती है, वहां कला अक्सर दम तोड़ देती है।
कला बनाम राजनीति-टिकाऊ कौन ?
इतिहास गवाह है – कई कलाकार राजनीति में आए, पर उनमें से अधिकांश अपनी मौलिक पहचान खो बैठे। चाहे स्मृति ईरानी हो या कंगना रनौत – एक समय जिनका नाम कला के कारण गूंजता था,अब वे सत्ता की जंग में घिर क्र अपनी पहचान की चमक खो चुकी हैं।
राजनीति टाइगर की सवारी है- एक बार चढ़ गए तो उतरना मुश्किल और जब कोई राजनीती के खेत्र में बिना अनुभव हाथ आजमाए तो यह शेर की सवारी करने जैसा है खासकर किसी कलाकार के लिए ,जब वो राजनैतिक स्वरुप के शेर पर सवार होता है, तो उसके सुर, उसकी पहचान, उसका आत्मबल, सब तो दांव पर लग ही जाते हैं विडंबना यह की इस क्षेत्र सफलता मिलेगी या नहीं या फिर वो वापस अपने क्षेत्र पर उतर सकेगी ,कुछ पता नहीं होता उसपर अनुभवहीन होने से खेल ख़त्म की सम्भावना और बढ़ जाती है।

निष्कर्ष – अगर मैथिली हारी तो शायद हम जीत जाएंगे
मैथिली ठाकुर के फैंस सोशल मीडिया पर भावुक सुझाव रख रहे हैं, वे कहते हैं ,“बेटी, तू गा। तेरी आवाज़ में जो जादू है, वो किसी कुर्सी से बड़ा है। ”कम उम्र में शोहरत, पैसा, या सत्ता मिल जाना अक्सर एक “लॉटरी” की तरह होता है-क्षणिक, चमकदार, पर खतरनाक। जेन पार्क हार कर समझी थी कि सच्ची जीत वही है जिसमें खुद को खोना न पड़े और इसलिए, अगर मैथिली यह चुनाव हार भी जाए तो भी उसकी आवाज़, उसका हुनर, उसका बचपन, और उसकी पहचान जीत जाएंगे। पर काश की ऐसा हो पाता।
