Bhopal Gas Tragedy: पीथमपुर में पहले भी 30 टन से ज्यादा जहरीला कचरा लैंडफिल हो चुका है। नतीजा यह हुआ कि गांव की नदी का पानी पूरी तरह काला हो गया। ग्रामीण बताते हैं कि इस पानी से सिंचाई करने पर फसलें बर्बाद हो जाती हैं और पशु इसे पीने से गंभीर रूप से बीमार पड़ जाते हैं।
Bhopal Gas Tragedy: 1984 की भोपाल गैस त्रासदी के 42 साल बाद अब उसके बचे हुए जहरीले अवशेषों को भी स्थायी रूप से निपटाया जा चुका है। यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से निकले 337 टन विषैले कचरे को पहले रामकी कंपनी के प्लांट में जलाया गया था, जिसके बाद बची करीब 900 टन राख को अब पीथमपुर में लैंडफिल कर दिया गया है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के निर्देश पर यह प्रक्रिया पूरी की गई है।
कचरे को जलाने की प्रक्रिया पूरी हुई छह माह पहले
भोपाल की यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से कुल 337 टन जहरीला कचरा छह माह पहले रामकी एनवायरो कंपनी के पीथमपुर प्लांट में लाया गया था। यहां इसे सुरक्षित तरीके से जलाया गया, जिससे लगभग 900 टन राख बची। जुलाई महीने से यह राख कंपनी परिसर में एक विशेष प्लेटफॉर्म पर रखी हुई थी। विशेषज्ञों ने इस राख की जांच की और इसे दफनाने के लिए तैयार किया गया।
राख को दफनाने का तरीका और सुरक्षा उपाय
राख को दफनाने के लिए जमीन से चार फीट ऊंचाई पर एक प्लेटफॉर्म बनाया गया। इसमें एचडीपीई (HDPE) लाइनर बिछाया गया, जिस पर राख को विशेष पैकेटों में रखा गया। अब इसे मिट्टी से पूरी तरह ढक दिया गया है और ऊपर पौधारोपण किया जाएगा। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार, राख में मरकरी, निकल, जिंक, कोबाल्ट, मैंगनीज सहित अन्य तत्व मौजूद हैं, लेकिन यह व्यवस्था ऐसी है कि राख पानी के संपर्क में नहीं आएगी और भूजल प्रभावित नहीं होगा। यह लैंडफिल साइट आबादी वाले क्षेत्र से आधा किलोमीटर दूर है। हाईकोर्ट में इसकी रिपोर्ट जल्द पेश की जाएगी।
पिछले अनुभव और स्थानीय चिंताएं
सोलह साल पहले भी पीथमपुर में यूनियन कार्बाइड से जुड़े 30 टन से ज्यादा कचरे की राख को लैंडफिल किया गया था। ग्रामीणों का आरोप है कि उससे पास की नदी का पानी काला हो गया और खेतों में इस्तेमाल करने पर फसलें खराब हो जाती हैं। इसलिए अब भी स्थानीय लोग इस नई राख दफनाने से चिंतित हैं। हालांकि, अधिकारियों का दावा है कि इस बार की व्यवस्था पूरी तरह सुरक्षित है।

