वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक बदलावों के बीच भारत में निवेश करने का रुझान तेजी से बढ़ा है। मैकिन्से (McKinsey) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, विदेशी निवेशकों और लिमिटेड पार्टनर्स (LPs) के लिए हमारा देश अब एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सबसे पसंदीदा जगह बन चुका है।
मैकिन्से के इस हालिया सर्वे में 50 से अधिक ग्लोबल लिमिटेड पार्टनर्स (LPs) को शामिल किया गया था। इस सर्वे के नतीजे स्पष्ट रूप से बताते हैं कि प्राइवेट मार्केट के मामले में भारत ने अपनी स्थिति काफी मजबूत कर ली है। आपको बता दें कि लिमिटेड पार्टनर्स वे निष्क्रिय निवेशक होते हैं जो साझेदारी में पूंजी तो लगाते हैं, लेकिन कंपनी के दैनिक संचालन या प्रबंधन में हिस्सा नहीं लेते। उनका मुख्य लक्ष्य मुनाफे में हिस्सेदारी होता है और उनकी जवाबदेही सिर्फ उनके निवेश तक सीमित होती है।
सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि 31 प्रतिशत संस्थागत निवेशकों ने भारत को अपनी पहली पसंद बताया है। वहीं, लगभग 76 प्रतिशत निवेशकों ने इसे अपने शीर्ष तीन विकल्पों में रखा है। यह संस्थागत निवेशकों के बीच भारत की अर्थव्यवस्था के प्रति बढ़ते मजबूत विश्वास को दर्शाता है।
भारत में निवेश क्यों बढ़ रहा है?
पिछले कुछ वर्षों में भू-राजनीतिक तनावों और व्यापक आर्थिक दबावों के कारण एशिया-प्रशांत क्षेत्र के समग्र प्राइवेट मार्केट में गिरावट देखी गई है। इसके बावजूद, भारत ने एक शानदार प्रदर्शनकर्ता के रूप में खुद को उभारा है।
आंकड़ों पर गौर करें तो, साल 2016-2020 और 2021-2025 के बीच प्राइवेट इक्विटी (PE) और वेंचर कैपिटल (VC) निवेश 1.6 गुना बढ़कर 207 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। इसी अवधि के दौरान निवेशकों की निकासी (Exits) भी दोगुने से अधिक होकर लगभग 120 बिलियन डॉलर के स्तर पर आ गई है।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में होने वाले कुल प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटल डिप्लॉयमेंट में भारत की हिस्सेदारी भी तेजी से बढ़ी है। साल 2015-19 में यह आंकड़ा लगभग 12 प्रतिशत था, जो 2020-24 में उछलकर लगभग 21 प्रतिशत हो गया है। यह आंकड़ा वैश्विक पूंजी आवंटन में भारत के बढ़ते महत्व को साफ तौर पर उजागर करता है।
यूरोपीय निवेशकों का खास फोकस
विदेशी निवेशक अब एशिया में अपनी रणनीति बदल रहे हैं और लिमिटेड पार्टनर्स इस बदलाव को अपनी पूंजी के साथ समर्थन दे रहे हैं। सर्वे में शामिल निवेशकों के कुल एशिया-प्रशांत निवेश एक्सपोजर में से एक तिहाई से ज्यादा हिस्सा अब अकेले भारत में है।
विशेष रूप से यूरोपीय निवेशकों का रुझान भारतीय बाजार की तरफ बहुत अधिक है। उनका लगभग 60 प्रतिशत एक्सपोजर भारत में बना हुआ है। कुल मिलाकर, सर्वे में शामिल लिमिटेड पार्टनर्स अपने भारतीय एक्सपोजर का लगभग 64 प्रतिशत प्राइवेट मार्केट में आवंटित कर रहे हैं। यह लंबी अवधि में भारत के विकास पथ पर उनके अटूट भरोसे का संकेत है।
किन सेक्टर्स में आ रहा है सबसे ज्यादा पैसा?
भारत के प्रति इस भारी आकर्षण का मुख्य कारण यहां की मजबूत ढांचागत वृद्धि (structural growth) है। निवेशक भारत की आर्थिक वृद्धि दर, जीडीपी, घरेलू खपत और उद्यमशीलता की प्रतिभा को अन्य क्षेत्रीय बाजारों की तुलना में बहुत अधिक रेटिंग दे रहे हैं।
अगर सेक्टर्स की बात करें, तो सबसे ज्यादा पूंजी उन उद्योगों में जा रही है जहां मांग तेजी से बढ़ रही है। साल 2021 से 2025 के बीच प्राइवेट इक्विटी का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा मुख्य रूप से पांच सेक्टर्स में आया है। इनमें टेक्नोलॉजी सेक्टर 29 प्रतिशत के साथ सबसे आगे है। इसके बाद वित्तीय सेवाओं (Financial Services) में 15 प्रतिशत और आईटी सेवाओं (IT Services) में 13 प्रतिशत निवेश हुआ है।
निवेशकों की बदलती रणनीति और सह-निवेश
समय के साथ निवेशकों की रणनीति में भी एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। वे अब शुरुआती चरण (early-stage) के निवेश की तुलना में परिपक्व रणनीतियों को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। लिमिटेड पार्टनर्स बायआउट (buyout) और ग्रोथ इक्विटी को लेकर अधिक उत्साहित नजर आ रहे हैं। 10-पॉइंट स्केल पर उन्होंने इन्हें क्रमशः 7.8 और 7.7 का बेहतरीन स्कोर दिया है।
इसके अलावा, बाजार में सह-निवेश (Co-investments) का चलन भी काफी तेजी से बढ़ रहा है। हाल के वर्षों में कुल डिप्लॉयमेंट वैल्यू में इसकी हिस्सेदारी 25 से 28 प्रतिशत तक रही है। इसमें भाग लेने वाले 54 प्रतिशत लिमिटेड पार्टनर्स ने फंड निवेश की तुलना में बेहतर प्रदर्शन की सूचना दी है।
भारत में निवेश के सामने क्या हैं चुनौतियां?
हालांकि, विकास की इस तेज गति के बीच कुछ संरचनात्मक चुनौतियां भी हैं। मैकिन्से की रिपोर्ट उन बाधाओं को भी रेखांकित करती है, जो इस लय को धीमा कर सकती हैं।
सबसे पहले, जीडीपी के अनुपात में भारत की निजी पूंजी की तीव्रता अभी भी अपेक्षाकृत मामूली है। इसके अलावा, पूंजी का प्रवाह केवल कुछ चुनिंदा सेक्टर्स तक ही सीमित है, जिसे व्यापक बनाने की जरूरत है। फंड जुटाने की प्रक्रिया भी काफी असंतुलित दिखाई देती है। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2022 और 2024 के बीच जुटाई गई कुल पूंजी का 64 प्रतिशत हिस्सा केवल छह सबसे बड़े जनरल पार्टनर्स (GPs) के पास गया है।
लिमिटेड पार्टनर्स ने कुछ परिचालन बाधाओं का भी जिक्र किया है। इनमें मुद्रा जोखिम (currency risk), एक जटिल कर प्रणाली, व्यवसाय करने में कठिनाई (Ease of doing business) और अनुबंध लागू (contract enforceability) करने की चुनौतियां शामिल हैं। बाजार में व्यापक और सुचारू भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए इन चिंताओं को दूर करना बेहद आवश्यक है।
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भविष्य की राह
तमाम चुनौतियों के बावजूद, निवेशकों का इरादा पूरी तरह से सकारात्मक बना हुआ है। सर्वे में शामिल 50 प्रतिशत से अधिक लिमिटेड पार्टनर्स भारत-समर्पित फंडों में अपना आवंटन बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। वहीं, केवल 5 प्रतिशत निवेशकों को ही अपना एक्सपोजर कम होने की उम्मीद है।
जैसे-जैसे वैश्विक पूंजी एशिया में पुनर्संतुलित हो रही है, भारत का बढ़ता पैमाना, विकास दर और बाजार की परिपक्वता इसे आने वाले वर्षों में प्राइवेट मार्केट के लिए एक प्रमुख केंद्र बनाती है।
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