रीवा में बिक्री हो रही प्रतिबंधित थाई मांगुर मछली, जाने क्यों है यह हानिकारक

रीवा। सेहत पर हानिकारक दुष्प्रभाव डालने के चलते भारत सरकार की ओर से थाई मांगुर मछली के पालन, बिक्री व परिवहन पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसके बावजूद रीवा जिले में धड़ल्ले से थाई मांगुर मछली को बेचा जा रहा है। मछली की हानियों से अंजान लोग इसे खरीद कर खा रहे हैं। रीवा में प्रतिबंधित मछली बिक्री का यह मामला तब सामने आया जब मनगवां नगर परिषद क्षेत्रांतर्गत बाईपास स्थित मछली विक्रेता इसताक मोहम्मद एवं चिकन शॉप में मछली विभाग की टीम पहुची और जांच के दौरान मछली हाथ लग गई। जिस पर मांगुर मछली की जप्ती की कार्यवाही मत्स्य पालन विभाग की टीम एवं मुख्य नगर परिषद अधिकारी द्वारा संयुक्त रूप से की गई। उप संचालक मत्सस्यपालन अंजना सिंह ने बताया कि इस दौरान लगभग 130 किलोग्राम मांगुर मछली का नगर परिषद के सहयोग से विनिष्टिकरण किया गया।

मुनाफा खोरी में सेहत से खिलवाड़

मछली के सेवन को चिकित्सक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक बताते हैं, लेकिन मांसाहारी प्रवृत्ति व गंदे पानी में भी जीवित रहने वाली थाई मांगुर मछली से दूर रहने की सलाह देते हैं। वहीं मुनाफाखोरी के चक्कर में क्षेत्र में धड़ल्ले से इस मछली को बेचा जा रहा है। इससे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के फैलने की भी आशंका रहती है। स्थानीय बाज़ार में भी इस मछली की अच्छी माँग है क्योंकि यह अन्य मछलियों की तुलना में कम दाम पर बिक्री होती है। यही वजह है कि गरीब तपके के लोग इस मछली को खाने के उपयोग में ले लेते है।

थाई मागुर मछली

थाई मागुर मछली कैटफ़िश के समूह से संबंधित है। यह विविध रे-फ़िन्ड मछलियों का एक समूह है। इनका यह नाम उनके अत्यंत प्रमुख बारबेल्स के कारण पड़ा है, जो बिल्ली की मूंछों जैसे दिखते हैं। ये विभिन्न आकार और आकृतियाँ रखती हैं और कई तरह के व्यवहार पैटर्न प्रदर्शित करती हैं। थाई मागुर को वैज्ञानिक रूप से क्लेरियस गैरीपिनस के नाम से जाना जाता है और यह 3-5 फुट लंबी हवा में सांस लेने वाली मछली है जो अपनी कृत्रिम श्वसन प्रणाली के कारण सूखी ज़मीन पर चल सकती है और कीचड़ में भी पनप सकती है।

भारत में थाई मागुर की खेती पर प्रतिबंध क्यों लगाया गया है?

भारत में थाई मागुर नामक मछली के पालन पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने 2000 में प्रतिबंध लगा दिया था। ऐसा मुख्यतः इस मांसाहारी मछली द्वारा जलीय आवास में अन्य मछलियों के लिए उत्पन्न खतरे के कारण किया गया था। शोध के अनुसार, थाई मागुर भारत की देशी मछली प्रजातियों में 70 प्रतिशत कमी के लिए ज़िम्मेदार है, जिसका जलीय पारिस्थितिकी तंत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा, मछुआरे इन्हें पालक के साथ सड़ा हुआ मांस खिलाते हैं, जिससे पानी प्रदूषित होता है और जलाशय का पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो जाता है। स्वस्थ विशेषज्ञ इस मछली के उपयोग की सलाह नही देते है। इसका सेवन करने से मानव के स्वस्थ पर प्रतिकूल असर पड़ता है और कैंसर जैसी घातक बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। वजह है कि यह मछली सढ़ा खाद्रय प्रदार्थ का उपयोग करती है। प्रतिबंध के बाद भी थाई मगुर मछली बाजार में बिक्री हो रही है।

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