Bagheli Ukkhan Hindi Mein: हम सबने अपने घर-परिवार या आसपास कभी न कभी किसी को गुस्से या शिकायत में यह कहते जरूर सुना होगा- “वो मुझे तेल की छाँह देखता है।” कभी-कभी हंसी और व्यंग्य में भी इसका प्रयोग किया जाता है। इसे थोड़ा सरल एवं सहज शब्दों में कहें तो- जब कोई व्यक्ति किसी के प्रति मन में झिझक, संकोच या डर की भावना रखते हुए व्यवहार करता है, उस स्थिति में यह कहा जा सकता है कि वह “तेल की छाहँ” देख रहा है।
“तेल की छाहं देखना” क्या होता है
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर “तेल की छाहं देखना” क्या होता है? इसका अर्थ क्या है और यह कहावत लोक में इतनी ज्यादा क्यों प्रचलित है। दरसल “तेल की छाँह देखना” बघेलखंड में होने वाली एक पुरानी लोकपरंपरा से जुड़ा हुआ है। दरसल इस रस्म में पिता अपने नवजात बच्चे को पहली बार आमने-सामने नहीं देखता, बल्कि पहले तेल में दिखने वाली उसकी परछाईं से देखता है। अब शायद आपमें से कई लोगों को अंदाजा हो गया होगा, कि हम किस लोकपरंपरा की बात कर रहे हैं।
क्या होता है सताइसा
दरसल अपने विंध्य-बघेलखंड के साथ ही भारत के पूर्वी क्षेत्रों विशेषतः अवध, पूर्वांचल और भोजपुर में “सताइसा पूजन” की एक विशेष परंपरा प्रचलित है। भारतीय ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार अश्विनी, अश्लेषा, मघा, मूल, ज्येष्ठा और रेवती इन छः नक्षत्रों को गंडमूल माना जाता है। मान्यता है यदि किसी शिशु का जन्म इन नक्षत्रों में होता है तो अपने यहाँ बघेलखंड में उसे सताइसा कहा जाता है। लोक में माना जाता है सताइसा में जन्म लेना बच्चे के पिता के लिए बहुत घातक होता है, इसीलिए जन्म के बाद भी पिता अपने बच्चे को प्यार-दुलार करना तो दूर, देख भी नहीं पाता है। इस स्थिति में दोष के निवारण के लिए, जन्म के 27वें दिन जब वही नक्षत्र पुनः आता है, तो विशेष विधि-विधान के साथ सताइसा की पूजा कराई जाती है और उसके उन्मूलन के बाद ही पिता अपने बच्चे को पहली बार देखता है।
क्यों करवाया जाता है “सताइसा पूजन”
अब जिस दिन सताइसा पूजा होती है, उस दिन एक खास परंपरा निभाई जाती है। बच्चे का पिता अपना सर मुंडवाता है और फिर नहाकर अपने ससुराल से आए कपड़े पहनकर पूजा में बैठता है। बच्चे की माँ भी अपने मायके से आए कपड़े पहनती है और फिर विधिवत पूजा आरंभ होती है। यह पूजा बहुत लंबी लगभग 3-4 घंटे तक चलती है। लेकिन बाकि पूजा की विधि के साथ इस दिन बेहद अनोखी रस्म होती है।
“तेल की छाहं” देखने की परंपरा
जिसमें एक फुलहा खोरबा अर्थात कांसे की एक पेंदे वाली कटोरी में सरसों का तेल भरकर बच्चे के पिता के सामने रख दिया जाता है। इसके बाद नाउन या घर की कोई अन्य सयानी स्त्री नवजात बच्चे को गोद में लेकर उसके पिता के पीछे दाहिने कंधे की ओर ऐसे झुककर खड़ी होती है, जिससे बच्चे की परछाईं कटोरे में रखे तेल से पिता को दिखाई दे। उसके बाद पिता अपने बच्चे को पहली बार प्रत्यक्ष नहीं, बल्कि तेल की छाँह के माध्यम से देखता है।
बघेली उक्खानों को सहेजना जरूरी
अनूठी है पर यह अपनी परंपरा है, लेकिन लोक में इससे भी कहावत, किहनूत इत्यादि गढ़ लिए गए। लेकिन हमारे विंध्य और बघेलखंड की यही तो खूबसूरती है, क्योंकि यहाँ लोकपरम्पराएं आज भी सांस लेती हैं, यहाँ की बोली में मोहक मिठास और अपनापन है और किस्सों और गीतों में पुस्तों की यादें हैं।
