Bagheli Lok Katha: आज हम धनेह गाँव की युवती और भरहुत के गड़रिये से जुड़ी एक लोक में प्रचलित लोककथा की बात करेंगे, जो पीढ़ियों से विंध्य और बघेलखंड के नागौद क्षेत्र के लोकजीवन में सुनाई जाती रही है। साथ ही हम इस कथा से जुड़े गोबराँव के सतीलेख, बकाउली बावली, भरहुत की पुरातात्विक खोज, सर अलेक्ज़ेंडर कनिंघम के शोध तथा उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों की भी तथ्यपरक पड़ताल भी करेंगे।
किस्सा से जुड़ा बघेली बिरहा
बघेलखंड के नागौद क्षेत्र में एक बिरहा अत्यंत प्रसिद्ध है- “पानी भरन बकाउली, बसीं रे गाँव धनेह, भरहुत केर गड़रिया जेहि से जुरा सनेह।” अर्थात धनेह गाँव की रहने वाली एक लड़की, पानी भरने बकाउली जाती है, जहाँ भरहुत गाँव के गड़रिया से उसका स्नेह जुड़ गया।
भरहुत की ऐतिहासिक प्रेम कहानी
इस बिरहा के पीछे की जो लोककथा यहाँ प्रचलित है, उसके अनुसार- भरहुत के निकट धनेह गाँव में एक कन्या रहती थी। यह उस समय की बात है, जब जीवन आज की तरह सुख-सुविधाओं से सम्पन्न नहीं था। तब ना पर्याप्त कुएं थे और ना ही आज की तरह नल-जल। तो लोग पानी भरने के लिए नदी और तालाबों के अतिरिक्त राजकुटुंब द्वारा बनवाए गए बावलियों में जाते थे। धनेह गाँव की स्त्रियाँ और युवतियाँ भी टमस नदी के किनारे स्थित बकाउली नाम की बावली में पानी भरने जाती थीं।
उस समय पानी लाने का भी अपना एक अलग तरीका होता था। जिसमें युवतियाँ सिर पर घड़ों के ऊपर घड़ा रखकर पानी लाती थीं। हममें से कई लोगों ने गाँव में ऐसा पानी लाने का यह दृश्य देखा ही होगा या कई बहनों ने इसी तरीके पानी लाया भी होगा। लेकिन पानी लाने के इस काम में एक तकनीकी दिक्कत भी होती थी। अब युवतियाँ और स्त्रियाँ एक घड़ा तो स्वयं रख लेती थीं, लेकिन उसके ऊपर दूसरा घड़ा रखने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति के सहारे की आवश्यकता पड़ती थी। अब एक दिन क्या हुआ, कि उस लड़की के घर में दोपहर के समय पानी खत्म हो गया। तो वह अपनी सखी-सहेलियों के बिना अकेले ही पानी लेने के लिए बावली चली गई।
अब उसने पानी भरकर पहला घड़ा तो अपने सिर पर रख लिया, पर दूसरा घड़ा ऊपर रखने के लिए उसे किसी सहारे की आवश्यकता थी। उसने देखा बावली के पास ही एक गड़रिए का लड़का अपनी भेंड़ चरा रहा है, उसने उसे मटका रखने के लिए आवाज दी। लड़का आया और उसने लड़की के सर पर मटका रख दिया। केवल यही एक पल था, जिसने दो अजनबियों के बीच एक अनकहा लेकिन अटूट रिश्ता जोड़ दिया।
कन्या और युवक में हुआ प्रेम
अब यह रोज का नियम बन गया था, लड़की पानी भरने आती, एक घड़ा स्वयं रखती, दूसरा घड़ा वही गड़रिये का लड़का अपने हाथों से रख देता था। दिन बीतते गए, दोनों जवाँ और किशोरावय थे। पहले परिचय हुआ, फिर अपनापन, स्नेह, और धीरे-धीरे उनके हृदयों में एक-दूसरे के लिए मौन प्रेम का अंकुरण होने लगा। यह वह समय था जब प्रेम की अभिव्यक्ति शब्दों से कम, आँखों की झिझक और मौन मुस्कान में ज्यादा होती थी। क्योंकि वह मध्यकालीन समाज था, शायद उस समय के सामाजिक बंधनों और रूढ़िवादी युग में अभिव्यक्ति की व्यंजना का ज्यादा स्थान नहीं था, पर दोनों एक-दूसरे से अनकहा प्रेम करने लगे थे।
युवक को नाग ने डस लिया
लेकिन वाह रे नियति का खेल, शायद भाग्य में उन दोनों का साथ नहीं बदा था। एक दिन लड़की नित्य-प्रतिदिन की भांति बावली में पानी भरने जाती है और एक घड़ा तो स्वयं रख लेती है। लेकिन जैसे ही गड़रिये का लड़का दूसरा घड़ा रखने लगता है, घड़े में पानी भरते समय जाने कहाँ से काला नाग घुस गया था, उसने लड़के को डस लिया जिसके कारण उसकी मृत्यु हो जाती है।
युवती हो जाती है सती
उसको सांप काटा देख लड़की रोने-चिल्लाने लगती है और आस-पास के लोग इकट्ठा हो जाते हैं और लड़के के साथी संगति भी आ जाते हैं, अब चूंकि पहले के समय में गड़रिया समुदाय के चरवाहे लोग अर्धघुमंतू जीवन शैली का पालन किया करते थे, तो उसके साथी संगति उसका अंतिम संस्कार वहीं बावली के पास ही करने लगते हैं। अब उस लड़की ने तो मन ही मन गड़रिए के लड़के को अपना पति मान लिया था इसीलिए वह भी अपने प्रेम की घोषणा करके उसके साथ सती हो जाती है।
कनिंघम ने की थी भरहुत की खोज
अब चूंकि इस लोककथा को हमने भी सुन रखा था और बाद में बघेलखंड की लोकसंस्कृति के अगुआ पद्मश्री बाबूलाल दाहिया की पोस्ट के माध्यम से हमें इस लोककथा से संबंधित एक रोचक किस्सा पता चला। 1883-84 में कनिंघम साहब जब भरहुत पर अपनी पुरातात्विक खोज कर रहे थे, तो इस दौरान उन्होंने भरहुत के अवशेष आस-पास के गांवों में भी मिल रहे थे, जहाँ लोगों ने अपने घरों में इसके पत्थरों को लगा लिया था, उन्होंने उन्हें खोज-खोज कर इकट्ठा किया और भरहुत जैसी पुरातात्विक संपदा का संरक्षण किया, उन्हें अंडभूत और छदंत जातक की एक कथा के अंकन वाला पत्थर निकट के गाँव के धोबीघाट से प्राप्त हुआ था, जिस पर रखकर कपड़े धोए जाते थे। इन्हीं खोजों के दौरान एक दिन उन्होंने एक अहीर द्वारा गाए बिरहे और यहाँ प्रचलित इस लोककथा के आधार पर, टमस नदी के किनारे धनेह और गोबराँव गाँव के मध्य स्थित उस बावली के स्थान को चिन्हित किया और उन्हें वहाँ से एक सतीलेख प्राप्त हुआ।
सर कनिंघम ने नहीं किया कोई जिक्र
अब हमने जब इस लोक कथा और ऐतिहासिक अनुसंधान की सत्यता की पड़ताल करने के लिए, सर अलेक्ज़ेंडर कनिंघम की दो किताबों “रिपोर्ट्स ऑफ ए टूर ऑफ बुंदेलखंड एंड रीवा” और “द स्तूप ऑफ भरहुत” का गहन अध्ययन किया, तो हमें इस बिरहे अथवा उससे जुड़ी इस लोककथा का कोई उल्लेख नहीं मिला। कनिंघम ने भले ही इस कथा का जिक्र नहीं किया हो, पर विंध्य के नागौद से संबंध रखने वाले विद्वान, रामलखन सिंह परिहार ने अपनी पुस्तक- “नागौद राज्य के प्रतिहार” में गोबराँव के सतीलेख के संदर्भ में इस बिरहे और उससे जुड़ी लोककथा का संक्षिप्त उल्लेख किया है। उनके अनुसार यह अभिलेख एक सतीलेख है और गोबराँव में बावली के किनारे से ही प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त, यह कथा स्थानीय जनश्रुतियों और मौखिक परंपराओं में भी प्रचलित है। इसीलिए इन सभी तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में प्रचलित यह कहानी ऐतिहासिक स्रोतों की अपेक्षा लोकसंस्कृति की उपज अधिक है।

