Vedanta group के चेयरमैन और भारतीय उद्योगपति anil agrawal ने हाल ही में एक बातचीत में बताया कि वे पिछले लगभग 15 वर्षों से लंदन में रोज़ सुबह एक London Temple में दर्शन और भजन गाने के लिए जाते हैं। व्यस्त जीवन के बावजूद उनकी यह दिनचर्या आज भी नियमित तरीके से बनी हुई है।

लंदन में भी जारी है धार्मिक अनुशासन
Anil Agrawal लंबे समय से लंदन में ही रह रहे हैं, लेकिन भारतीय धार्मिक परंपराओं से उनका जुड़ाव कम नहीं हुआ है। उन्होंने बताया कि वे रोज सुबह एक राधा-कृष्ण मंदिर पहुंचते हैं, जहां वे पूजा, मंत्र-जाप और भजन में पूरे मन से हिस्सा लेते हैं। यह काम वर्षों से बिना रुके चल रहा है। उनके अनुसार, यह समय उन्हें मानसिक शांति और शरीर को संतुलन देता है, जो पूरे दिन के निर्णयों में मददगार भी साबित होता है।
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London Temple बना भारतीय समुदाय का केंद्र
जिस London Temple में वे जाते हैं, वह केवल पूजा का स्थान नहीं बल्कि भारतीय समुदाय के पूजा का भी केंद्र है। यहां नियमित रूप से भारतीय लोग इकट्ठा होते हैं और सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेते हुए पूजा करते हैं। खास बात यह है कि कुछ स्थानीय ब्रिटिश नागरिक भी यहां होने वाले भजन-कीर्तन में पूरे मन से शामिल होते हैं। इससे यह स्थान सांस्कृतिक मिसाल बनता दिख रहा है।
पूजा से पहले तुलसी को प्रणाम करने की परंपरा
Anil Agrawal ने अपनी दिन का एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सा भी शेयर किया है। वे मंदिर जाकर सबसे पहले तुलसी के पौधे को प्रणाम करते हैं। भारतीय परंपरा में तुलसी को सबसे पवित्र माना जाता है और यह उनकी आस्था का प्रतीक होता है। यह आदत उनके भीतर बसे सांस्कृतिक मूल्य को दर्शाती है, जिन्हें वे विदेश में रहते हुए भी निभा रहे हैं।
साधारण शुरुआत से वैश्विक पहचान तक
मुंबई में छोटे लेवल से अपने कारोबारी जीवन को शुरू करने वाले अनिल अग्रवाल आज विश्व स्तर पर पहचाने जाते हैं। हालांकि, वे ऐसा मानते हैं कि जीवन में अनुशासन, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक जुड़ाव ने उन्हें जमीन से पूरी तरह जोड़े रखा। उनका कहना है कि मंदिर में बिताया गया समय उन्हें विनम्रता और स्पष्ट सोच देता है, जो उन्हें बिजनेस में अच्छी सोच देने में मदद करता है।
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आध्यात्म और सफलता का संतुलन
अनिल अग्रवाल की याद दिनचर्या हमें बताती है की सफलता के साथ-साथ आध्यात्मिक संतुलन भी संभव होता है। तेज रफ्तार वाले कॉर्पोरेट जीवन के बीच रोजाना मंदिर जाना उनके लिए आत्मिक ऊर्जा का स्रोत बनता जा रहा है इससे हमें पता चलता है की भौगोलिक दूरी के बावजूद सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखा जा सकता है। यह पूरी जानकारी अनिल अग्रवाल के द्वारा दिए जाने वाले इंटरव्यू पर आधारित है जिसमें उन्होंने खुद अपने जीवन की शुरुआती दिनचर्या को बताया था।
