भारतीय सिनेमा का इतिहास कई ऐसी कहानियों से भरा पड़ा है जो किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं लगतीं। आज हम बॉलीवुड के एक ऐसे ही दिग्गज की बात कर रहे हैं, जिसने अपने जीवन की शुरुआत बेहद तंगहाली में की, यहाँ तक कि पेट पालने के लिए नाई की दुकान (सैलून) पर काम भी किया। लेकिन जब उन्होंने कैमरे के पीछे कमान संभाली, तो इतिहास लिख दिया।
हम बात कर रहे हैं मशहूर फिल्म निर्देशक प्रकाश मेहरा की। प्रकाश मेहरा ही वो शख्स थे जिन्होंने लगातार फ्लॉप फिल्मों की मार झेल रहे अमिताभ बच्चन पर भरोसा जताया और उन्हें भारतीय सिनेमा का पहला ‘एंग्री यंग मैन‘ बनाकर सुपरस्टारडम की राह पर खड़ा कर दिया। आइए जानते हैं संघर्ष, जुनून और सफलता की यह अनसुनी दास्तान।
संघर्ष का सफर: नाई की दुकान से मुंबई के फिल्म सेट तक
13 जनवरी 1939 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर में जन्मे प्रकाश मेहरा का शुरुआती जीवन बेहद कठिनाइयों से भरा था। घर की माली हालत ठीक नहीं थी, जिसके कारण उन्हें बहुत कम उम्र में ही काम करना पड़ा।
क्यों करनी पड़ी सैलून में नौकरी?
किस्मत आजमाने और पेट पालने के लिए प्रकाश मेहरा दिल्ली आ गए थे। दिल्ली में गुजारा करने के लिए उन्होंने काफी समय तक एक नाई की दुकान (सैलून) में काम किया। लेकिन उनकी आँखों में हमेशा कुछ बड़ा करने का सपना था। उन्हें लिखने का शौक था और वे फिल्मों की दुनिया में अपनी पहचान बनाना चाहते थे।
राइटर और गीतकार बनने का सपना
सैलून की नौकरी के साथ-साथ प्रकाश मेहरा ने शायरी और कविताएँ लिखना जारी रखा। इसी हुनर के दम पर उन्होंने मुंबई (तब बॉम्बे) का रुख किया। मुंबई आकर उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में बतौर प्रोडक्शन कंट्रोलर और असिस्टेंट डायरेक्टर काम करना शुरू किया। साल 1968 में उन्होंने शशि कपूर की फिल्म ‘हसीना मान जाएगी’ से बतौर स्वतंत्र निर्देशक कदम रखा, जो बॉक्स ऑफिस पर सफल रही। लेकिन उनकी असली परीक्षा अभी बाकी थी।
अमिताभ बच्चन का सबसे बुरा दौर: लगातार 12 फ्लॉप फिल्में
70 के दशक की शुरुआत में हिंदी सिनेमा में रोमांटिक फिल्मों का बोलबाला था। राजेश खन्ना इंडस्ट्री के इकलौते सुपरस्टार थे और दर्शक रोमांटिक कहानियों को पसंद कर रहे थे। इसी दौर में एक लंबा, पतली कद-काठी और भारी आवाज वाला नौजवान मुंबई में संघर्ष कर रहा था—नाम था अमिताभ बच्चन।
जब ‘लंबू’ को इंडस्ट्री ने नकार दिया था
अमिताभ बच्चन ने ‘सात हिंदुस्तानी’ से डेब्यू किया था, लेकिन इसके बाद उनकी बैक-टू-बैक करीब 12 से 13 फिल्में बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह पिट गईं। इंडस्ट्री के लोग उन्हें ‘फ्लॉप हीरो’ मानने लगे थे। मेकर्स उनकी लंबी हाइट और भारी आवाज को विलेन जैसी बताते थे। अमिताभ इतने निराश हो चुके थे कि उन्होंने अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर वापस इलाहाबाद लौटने का मन बना लिया था।
‘जंजीर’ का जन्म और हीरो की तलाश
उसी दौरान लेखक जोड़ी सलीम-जावेद ने एक ऐसी स्क्रिप्ट लिखी, जिसमें हीरो को रोमांस नहीं करना था, बल्कि व्यवस्था के खिलाफ लड़ना था। यह एक बेहद गंभीर और गुस्सैल पुलिस ऑफिसर ‘विजय’ की कहानी थी। प्रकाश मेहरा को यह स्क्रिप्ट बेहद पसंद आई और उन्होंने इसे डायरेक्ट करने का फैसला किया। लेकिन चुनौती थी—इस रोल को करेगा कौन?
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देव आनंद और राज कुमार ने ठुकरा दी थी फिल्म
प्रकाश मेहरा इस स्क्रिप्ट को लेकर उस समय के तमाम बड़े स्टार्स के पास गए।
- देव आनंद ने फिल्म इसलिए ठुकरा दी क्योंकि इसमें कोई गाना नहीं था।
- राज कुमार ने यह कहकर मना कर दिया कि उन्हें डायरेक्टर के बालों के तेल की खुशबू पसंद नहीं आई (बॉलीवुड के गलियारों में यह किस्सा काफी मशहूर है)।
- धर्मेंद्र ने भी कुछ व्यक्तिगत कारणों से इस प्रोजेक्ट से दूरी बना ली।
प्राण की एक सिफारिश और अमिताभ बच्चन की एंट्री
जब कोई बड़ा स्टार फिल्म के लिए तैयार नहीं हुआ, तब मशहूर अभिनेता प्राण ने प्रकाश मेहरा को अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘बॉम्बे टू गोवा‘ देखने की सलाह दी। प्रकाश मेहरा ने फिल्म में अमिताभ का फाइट सीन देखा और उन्हें तुरंत समझ आ गया कि उनके ‘इंस्पेक्टर विजय’ की तलाश पूरी हो चुकी है। मेहरा ने अमिताभ बच्चन के फ्लॉप ट्रैक रिकॉर्ड की परवाह किए बिना उन्हें मुख्य भूमिका के लिए साइन कर लिया।
‘जंजीर’ की सफलता और ‘एंग्री यंग मैन’ का उदय
साल 1973 में रिलीज हुई ‘जंजीर‘ ने रिलीज होते ही बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया। फिल्म का वो आइकॉनिक सीन जहाँ शेरखान (प्राण) के सामने इंस्पेक्टर विजय (अमिताभ बच्चन) कुर्सी को लात मारकर कहता है—“जब तक बैठने को न कहा जाए, शराफत से खड़े रहो, ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं!”—इस सीन ने दर्शकों को तालियां बजाने पर मजबूर कर दिया।
“जंजीर ने बॉलीवुड के रोमांटिक एरा को खत्म कर एक्शन और रियलिस्टिक सिनेमा की नींव रखी। अमिताभ बच्चन रातों-रात देश के सबसे बड़े स्टार बन गए और उन्हें ‘एंग्री यंग मैन’ का खिताब मिला।”
प्रकाश मेहरा और अमिताभ बच्चन की ब्लॉकबस्टर जोड़ी
‘जंजीर’ की ब्लॉकबस्टर सफलता के बाद प्रकाश मेहरा और अमिताभ बच्चन की जोड़ी हिंदी सिनेमा की सबसे सफल डायरेक्टर-एक्टर जोड़ियों में से एक बन गई। इन दोनों ने मिलकर एक के बाद एक कई कल्ट क्लासिक फिल्में दीं:
| फिल्म का नाम | रिलीज का साल | बॉक्स ऑफिस स्टेटस |
| जंजीर | 1973 | ब्लॉकबस्टर |
| हेरा फेरी | 1976 | सुपरहिट |
| मुकद्दर का सिकंदर | 1978 | ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर |
| लावारिस | 1981 | ब्लॉकबस्टर |
| नमक हलाल | 1982 | सुपरहिट |
| शराबी | 1984 | ब्लॉकबस्टर |
इन फिल्मों ने अमिताभ बच्चन के स्टारडम को उस ऊंचाई पर पहुँचाया जहाँ आज भी कोई अन्य अभिनेता नहीं पहुँच सका है।
निष्कर्ष: एक लीजेंड की विरासत
प्रकाश मेहरा का जीवन इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि अगर आपके पास हुनर और सही विजन है, तो आपकी शुरुआती परिस्थितियां आपके भविष्य को तय नहीं कर सकतीं। एक नाई की दुकान से शुरू हुआ उनका सफर भारतीय सिनेमा के शिखर तक पहुँचा। उन्होंने न केवल खुद को साबित किया, बल्कि अमिताभ बच्चन जैसे महान कलाकार के करियर को उस वक्त डूबने से बचाया जब पूरी दुनिया ने उनसे मुंह मोड़ लिया था। साल 2009 में भले ही प्रकाश मेहरा इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन उनका सिनेमा और उनका ‘विजय’ हमेशा अमर रहेंगे।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
Q1. प्रकाश मेहरा ने अमिताभ बच्चन के साथ कुल कितनी फिल्में कीं?
प्रकाश मेहरा ने अमिताभ बच्चन के साथ मुख्य रूप से 7 फिल्में निर्देशित कीं, जिनमें ‘जंजीर’, ‘हेरा फेरी‘, ‘खून पसीना‘ (बतौर प्रोड्यूसर), ‘मुकद्दर का सिकंदर‘, ‘लावारिस‘, ‘नमक हलाल‘, और ‘शराबी‘ शामिल हैं। इनमें से लगभग सभी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर ब्लॉकबस्टर साबित हुईं।
Q2. अमिताभ बच्चन को ‘एंग्री यंग मैन’ नाम कैसे मिला?
साल 1973 में आई फिल्म ‘जंजीर’ में अमिताभ बच्चन ने एक ऐसे पुलिस ऑफिसर का किरदार निभाया था जो समाज और कानून व्यवस्था के भ्रष्टाचार से बेहद गुस्से में रहता है। इसी फिल्म के बाद मीडिया और दर्शकों ने उन्हें ‘एंग्री यंग मैन’ का नाम दिया।
Q3. ‘जंजीर’ फिल्म की कहानी किसने लिखी थी?
‘जंजीर’ फिल्म की शानदार कहानी और डायलॉग्स मशहूर लेखक जोड़ी सलीम खान और जावेद अख्तर (सलीम-जावेद) ने लिखे थे।
Q4. प्रकाश मेहरा फिल्मों में आने से पहले क्या करते थे?
प्रकाश मेहरा फिल्मों में आने से पहले बेहद तंगहाली के दौर से गुजरे थे। उन्होंने दिल्ली में एक सैलून (नाई की दुकान) में काम किया और बाद में मुंबई आकर गीतकार और असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर संघर्ष किया।
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