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अजित पवार का निधन: महाराष्ट्र की राजनीति के एक युग का अंत

Ajit Pawar's

महाराष्ट्र की राजनीति के कद्दावर नेता और उपमुख्यमंत्री अजित पवार का निधन हो गया है। बुधवार सुबह बारामती में लैंडिंग से ठीक पहले उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें उनके साथ चार अन्य लोगों की भी जान चली गई। 66 वर्षीय अजित पवार न केवल एक अनुभवी प्रशासक थे, बल्कि वे राज्य की जमीनी सियासत की गहरी समझ रखने वाले नेता माने जाते थे।

बारामती में मातम का माहौल

अजित पवार के गृह क्षेत्र बारामती में जैसे ही इस हादसे की खबर पहुंची, पूरे इलाके में सन्नाटा पसर गया। विद्या प्रतिष्ठान मैदान पर हजारों की संख्या में लोग अपने ‘दादा’ को अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ पड़े। उनके समर्थकों के लिए यह केवल एक राजनीतिक क्षति नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत दुख है। वे एक ऐसे नेता थे जो अपने कार्यकर्ताओं को नाम से जानते थे।

प्रशासनिक पकड़ और कार्यशैली

अजित पवार अपनी सख्त कार्यशैली और समय की पाबंदी के लिए जाने जाते थे। सुबह जल्दी काम शुरू करना और फाइलों का तुरंत निपटारा करना उनकी पहचान थी। उन्होंने वित्त और सिंचाई जैसे महत्वपूर्ण विभागों का कार्यभार संभाला। अधिकारियों के बीच उनकी छवि एक ऐसे मंत्री की थी जो स्पष्ट निर्देश देते थे और काम में कोताही बर्दाश्त नहीं करते थे।

NCP Leader Ajit Pawar Passes Away at 66

राजनीतिक सफर और चुनौतियां

करीब चार दशक लंबे राजनीतिक करियर में अजित पवार ने कई उतार-चढ़ाव देखे। 1999 में एनसीपी के गठन के बाद से ही वे पार्टी के मुख्य आधार रहे। हालांकि उन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप भी लगे, लेकिन उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता कभी कम नहीं हुई। उन्होंने रिकॉर्ड छह बार उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली, जो उनकी संगठन क्षमता और राजनीतिक कौशल का प्रमाण है।

धर्मनिरपेक्ष राजनीति के प्रति प्रतिबद्धता

भले ही अजित पवार ने सत्ता के समीकरणों के लिए भाजपा के साथ गठबंधन किया, लेकिन उन्होंने अपनी मूल विचारधारा से कभी पूरी तरह समझौता नहीं किया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कट्टरपंथी बयानों का विरोध किया और समावेशी राजनीति पर जोर दिया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चुनाव प्रचार के दौरान भी उन्होंने अपनी अलग राय रखी थी, जो उनके स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्तित्व को दर्शाता है।

एक अपूर्ण सपना: मुख्यमंत्री पद

अजित पवार की सबसे बड़ी राजनीतिक महत्वाकांक्षा महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनना था। कई बार वे इस पद के बेहद करीब पहुंचे, लेकिन समीकरण कुछ ऐसे बने कि यह लक्ष्य उनसे दूर रहा। उनकी कार्यक्षमता को देखते हुए कई राजनीतिक विश्लेषक मानते थे कि यदि उन्हें यह अवसर मिलता, तो वे राज्य के विकास मॉडल में बड़े बदलाव ला सकते थे।

भविष्य के सवाल और राजनीतिक विरासत

उनके जाने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनकी पार्टी का भविष्य क्या होगा। क्या उनके गुट का शरद पवार की मुख्य पार्टी में विलय होगा या वे स्वतंत्र रूप से भाजपा के साथ बने रहेंगे? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में मिलेंगे। फिलहाल महाराष्ट्र ने एक ऐसा नेता खो दिया है जिसे प्रशासन की रग-रग का पता था।

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