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एक ऐसे समाज सुधारक, भारत रत्न-राष्ट्र ऋषि नानाजी देशमुख

चित्रकूट। भारत रत्न-राष्ट्र ऋषि नानाजी देशमुख एक महान समाज सुधारक, शिक्षाविद् और प्रबुद्ध राष्ट्रनेता थे। उनका पूरा जीवन ग्राम विकास, शिक्षा और सामाजिक उत्थान के लिए समर्पित था। उनका नाम चंडिकादास अमृतराव देशमुख (नानाजी देशमुख) था। उनका जन्म 11 अक्टूबर 1916 (परभणी, महाराष्ट्र) में हुआ था और उन्होने अपनी अंतिम सांसे 27 फरवरी 2010 चित्रकूट में लिए थे।

राष्ट्र ऋषि की उपाधि

भारत रत्न नानाजी देशमुख को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने उन्हें उनके सामाजिक कार्यों और ग्रामीण विकास के योगदान के लिए राष्ट्र ऋषि की उपाधि से सम्मानित किया था। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्पित प्रचारक रहे और भारतीय जनसंघ के संस्थापकों में शामिल थे। उन्होंने गोरखपुर में देश का पहला सरस्वती शिशु मंदिर स्थापित किया। वर्ष 1991 में उन्होंने चित्रकूट में देश के पहले ग्रामीण विश्वविद्यालय महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की। उन्होंने ग्रामोदय से अंत्योदय और स्वावलंबन के सिद्धांत पर कार्य किया। चित्रकूट और उसके आसपास के गांवों को आत्मनिर्भर बनाने का बड़ा अभियान चलाया।

राष्ट्र नेता

नानाजी देशमुख 1977 से 1980 तक लोकसभा के सदस्य रहे और 1999 से 2005 तक राज्यसभा के मनोनीत सदस्य रहे। 1975 के आपातकाल के दौरान लोकनायक जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन में उन्होंने अहम संगठनात्मक भूमिका निभाई थी।

प्रमुख सम्मान

नानाजी देशमुख को कई अवार्ड मिले थें। उन्हे वर्ष 1999 में भारत सरकार द्वारा पद्मविभूषण से सम्मानित किया गया। वर्ष 2019 में मरणोपरांत भारत के सर्वाेच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। मृत्यु के बाद मानवीय चिकित्सा शिक्षा के लिए उन्होंने अपना शरीर एम्स को दान करने का संकल्प लिया था।

नाना जी देश मुख को क्यों कहा जाता था सामाज सुधारक

नानाजी देशमुख को एक महान समाज सुधारक इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपना पूरा जीवन ग्रामीण भारत के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज के कमजोर वर्गों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने उत्तर प्रदेश के चित्रकूट और बुंदेलखंड क्षेत्र के सैकड़ों गांवों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अथक प्रयास किए। उन्होंने गांवों में जल संरक्षण, सौर ऊर्जा, जैविक खेती और बायो-एनर्जी जैसे कार्यों को बढ़ावा दिया। वर्ष 1991 में उन्होंने चित्रकूट में भारत के पहले ग्रामीण विश्वविद्यालय-महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा (विशेषकर लड़कियों की शिक्षा) और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिए कई कार्यक्रम चलाए।

विवाद-मुक्त ग्राम मॉडल

उन्होंने गांवों से आपसी कलह और मुकदमों को खत्म करने के लिए विवाद-मुक्त गांव की परिकल्पना और मॉडल लागू किया। वर्ष 1980 में 60 वर्ष की आयु में उन्होंने सक्रिय राजनीति और सत्ता के मोह को छोड़कर पूरी तरह से सामाजिक सेवा और ग्राम विकास का मार्ग चुना। वे जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के प्रमुख प्रेरकों और वास्तुकारों में से एक थे।

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