देवतालाब। सावन का महीना भगवान भोले नाथ और माता पार्वती का विशेष मास माना गया है। शिव भक्त भगवान की पूजा-अर्चना में इन दिनों लगे हुए है। खास तौर से सावन सोमवार को शिवालयों में तो मानों अल सुबह से भक्तों का सैलाब ही उमड़ने लगता है। ऐसे में विंध्य क्षेत्र का ऐसा अदभुद्र शिव मंदिर जिसकी चर्चा देश भर के तीर्थ स्थलों में होती है। मउगंज जिले के देवतालाब स्थित मंदिर में भगवान की एक ही स्थान पर 5 अलौकिक शिवलिंग है। तो ठीक सामने माता पार्वती का मंदिर है। यहां पहुचने वाले शिव भक्त शिव और माता पार्वती की गठजोड़ करवाते है। बताते है कि शिव मंदिर देवतालाब एक ऐसा अलौकिक और ऐतिहासिक धार्मिक केंद्र है, जिसकी मान्यता है कि यहाँ भगवान भोलेनाथ के दर्शन और जलाभिषेक मात्र से ही चारधाम की यात्रा का पूर्ण पुण्य प्राप्त हो जाता है।
ऐसा है चमत्कारिक शिव मंदिर
ऐसी किंवदंती है कि इस भव्य मंदिर को भगवान विश्वकर्मा ने स्वयं बनाया था। रहस्यमयी शिवलिंग को लेकर बताया जाता है गर्भगृह में स्थित शिवलिंग का रंग दिन में चार बार बदलता है, जो इसे बेहद चमत्कारी बनाता है। मंदिर प्रांगण में स्थित प्राचीन शिव कुंड से जल लेकर श्रद्धालु भगवान का अभिषेक करते हैं। विंध्य क्षेत्र की यह मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से पूजा करने वाले भक्तों को चारों धामों (बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी, रामेश्वरम) के बराबर पुण्य मिलता है।
सुबह देखा गया भव्य मंदिर
बताया जाता है कि देवतालाब शिव मंदिर का मुख्य रहस्य यह है कि यह विशाल मंदिर बिना किसी जोड़ के केवल एक ही पत्थर से बना है और इसका निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने रातों-रात किए थें। किंवदंती है कि शाम तक यहाँ कुछ नहीं था, लेकिन अगली सुबह एक पूरा विशाल मंदिर देखा गया।
महर्षि मार्कण्डेय की तपोभूमि
कथा है कि शिव भक्त महर्षि मार्कण्डेय ने इस स्थान पर भगवान शिव के दर्शन के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिवजी के आदेश पर विश्वकर्मा ने यह मंदिर बनाया था। महर्षि मार्कण्डेय भारतवर्ष में सनातन और शिव भक्ति के प्रचार-प्रसार के लिए भ्रमण किया करते थे। उनकी इसी यात्रा के मध्य उनका आगमन विंध्य के रेवा क्षेत्र में हुआ जो वर्तमान में रीवा के नाम से जाना जाता है। रीवा में देवतालाब नामक स्थान पर जब महर्षि ने विश्राम के लिए अपना डेरा जमाया तब अनायास ही उनके मन में भगवान शिव के दर्शन की अभिलाषा जाग उठी। महर्षि ठहरे शिव भक्त तो उन्होंने अपने आराध्य से कह दिया कि चाहे जिस रूप में दर्शन मिलें किन्तु दर्शन मिलने तक वे यहीं तप करते रहेंगे।
कई दिनों तक महर्षि मार्कण्डेय देवतालाब में तप करते रहे। उनके तप की तीव्रता को देखकर भगवान शिव ने विश्वकर्मा जी को आदेश दिया कि वो उस स्थान पर एक शिव मंदिर का निर्माण करें। भगवान विश्वकर्मा जी ने एक विशालकाय पत्थर से रातों रात उस स्थान पर शिव मंदिर का निर्माण कर दिया। तपस्या में लीन महर्षि मार्कण्डेय को इस पूरी घटना का किंचित मात्र भी आभास नहीं हुआ। मंदिर बन जाने के पश्चात भगवान शिव की मानस प्रेरणा से महर्षि ने अपना तप समाप्त किया। शिव मंदिर देखकर महर्षि अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने वहाँ स्थित कुंड में स्नान कर भगवान शिव की आराधना की। तभी से यह मंदिर पूरे विंध्य प्रदेश में पूज्य है।
औरंगजेब के सेना ने की थी शिवलिंग को खंडित करने की कोशिश
कहा जाता है कि, मुगल शासक औरंगजेब के शासन काल में उसकी सेना देवतालाब पहुंच गई थी. सेना ने मंदिर में विराजित भगवान श्रृंगेश्वर नाथ रूपी शिवलिंग को खंडित करने का प्रयास भी किया था. जिसके बाद ही उसका शर्वनाश हो गया था. ऐसा कहते हैं कि, जब मुगल सेना ने शिवलिंग को तोड़ने के लिए शिवलिंग में प्रहार किया, तो उसमें तीन दरारें पड़ गई और एक दरार से खून तो दूसरे दरार से दूध. वहीं तीसरी दरार से गंगा की धारा निकल पड़ी. तब से ही यहां पर भगवान भोलेनाथ के श्रृंगेश्वर नाथ के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगने लगा। इतिहास में यह भी दर्शाया गया है कि भगवान विश्वकर्मा ने भोलेनाथ के इस मंदिर को स्वयं आकार दिया. उसके बाद रीवा रियासत के महाराजा ने भी मंदिर में कई विकास कार्य करवाए।

