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अकाल मृत्यु मुक्ति के 5 दिन, 18 से शुरू हो रहा यम पंचक, यमराज, धन्वंतरि, लक्ष्मी-गणेश और…

यम पंचक। ये 5 दिन आपके जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण होते है, क्योकि इससे आपके जीवन के महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हुए है। शास्त्रों के अनुसार दिवाली के पांच दिनों को यम पंचक कहा गया है क्योंकि इस दौरान मृत्यु के देवता यमराज, आरोग्य के देवता धन्वंतरि भगवान, लक्ष्मी-गणेश और अन्य देवी-देवताओं की पूजा होती है। इस पर्व में यम की पूजा करने और उनके नाम से दीपदान करने का विशेष महत्व होता है। कहते हैं दिवाली उत्सव के दौरान यमराज की पूजा करने से अकाल मृत्यु का डर नहीं रहता। कार्तिक मास में आने वाला यम पंचक का पर्व जीवन को सुख समृद्धि से भर देने वाला होता है।

इसलिए भी कहा जाता है यम पंचक

इन पांच दिनों को यम पंचक इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि यह अवधि यम-नचिकेता संवाद के गहन ज्ञान को याद करने का भी समय है। यम नचिकेता संवाद कठोपनिषद में वर्णित एक संवाद है, जिसमें नचिकेता नाम का एक युवा साधक यमराज से आत्मा और मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में गूढ़ प्रश्न पूछता है। कई लोग यम पंचकश् को ज्योतिषीय पंचकश् समझ लेते हैं लेकिन ये वो वाले पंचक नहीं हैं जो हर महीने में पड़ते हैं बल्कि दिवाली के त्योहार से जुड़े पांच दिनों को ही यम पंचक कहा जाता है।

18 से शुरू हो रहा यम पंचक

इस साल यम पंचक की शुरुआत 18 अक्टूबर 2025 से हो रही है और इसका समापन 23 अक्टूबर 2025 को गुरुवार को होगा। यम पंचक के दौरान धनतेरस, शनि त्रयोदशी, यम दीपम, दिवाली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज पर्व मनाया जाता है। धनतेरस पर यम (यमराज) का रिश्ता अकाल मृत्यु से बचाव और लंबी आयु का आशीर्वाद प्राप्त करने से है। इस दिन यमराज की पूजा की जाती है और घर के बाहर दक्षिण दिशा में यम के नाम का दीपक जलाया जाता है, जिसे यम दीपदान कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि इससे अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है।

यम और धनतेरस का रिश्ता

अकाल मृत्यु से बचाव यानि यम दीप जलाने की परंपरा का मुख्य उद्देश्य अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति पाना है। यह दीपक लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए जलाया जाता है। दीपक को घर के बाहर दक्षिण दिशा में रखा जाता है, क्योंकि यह दिशा यमराज की दिशा मानी जाती है। यम दीपदान से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और नकारात्मकता दूर होती है। यह एक प्राचीन परंपरा है जिसे धनतेरस या नरक चतुर्दशी के दिन मनाया जाता है।

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