Rewa Flood History In Hindi: रीवा में आई वर्ष 1997 की प्रचंड बाढ़ हो, या फिर 2003 में शहर को डुबा देने के लिए उतावली बीहर-बिछिया नदियों का उफान, 2016 की बाढ़ और जलभराव की भयावह स्थिति हो, या फिर 2025 में लगातार हो रही बारिश के कारण जलभराव के बाद शहर में मंडराता बाढ़ का खतरा हो। रीवा ने समय-समय पर प्रकृति के रौद्र रूप को देखा है। लेकिन क्या आप जानते हैं? कि रीवा ने अतीत में इससे भी कहीं अधिक भयानक जलप्रलय का सामना किया था, एक ऐसी बाढ़ जिसने पूरे नगर का नक्शा बदल दिया था। एक ऐसी आपदा, जिसमें हजारों मकान धराशायी हो गए थे और सैकड़ों लोग काल के गाल में समा गए और पूरा नगर अथाह जल में डूब गया था।
1882 में रीवा में आई थी बाढ़ | Rewa Flood History
17 जून 1882 का दिन रीवा के इतिहास में एक ऐसी भयावह त्रासदी के रूप में दर्ज है, जिसके बार में आज भी सोचते हैं, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उस दिन मात्र चौबीस घंटों के भीतर आसमान ने ऐसा प्रकोप बरपाया, ऐसी जबरजस्त बारिश हुई कि पूरी राजधानी ही जलप्रलय की चपेट में आ गई। लगातार हुई मूसलाधार बरसात ने, अपने ही सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए और एक ही दिन में लगभग 22 इंच बारिश हुई। अब चूंकि रीवा बीहर-बिछिया और झिरिया नदियों के मध्य बसा है, तो बारिश के कारण इन नदियों ने विकराल रूप धारण कर लिया। विशेषतः बीहर जिसके किनारे है तब का रीवा का मुख्य नगर आबाद था, उसका जलस्तर इतना बढ़ गया कि राजधानी के किनारे बहने वाली इस नदी ने अचानक से विकराल रूप धारण कर लिया। बीहर का जलस्तर इतना बढ़ गया था कि नदी का कोई ओर-छोर दिखाई नहीं देता था, न तो उसका किनारा दिखाई देता था और न ही उसका विस्तार समाप्त होता था। इसी बीच शहर के मध्य स्थित नगरिया तालाब की भीट मने मेड़ बीहर की तेज धारा से टूट गई। बाँध टूटते ही पानी का विशाल प्रवाह गर्जना करता हुआ शहर के गलियों-मोहल्लों और मुख्य मार्गों में घुस पड़ा। अब चूंकि उस समय रीवा शहर कितना बड़ा था ही, उपरहटी-तरहटी और उसके आस-पास के क्षेत्रों तक। तो देखते ही देखते सड़कें कट गईं, रास्ते बह गए और पूरा नगर अथाह जलसागर में डूबने लगा।
रीवा रियासत के द्वारा बचाव कार्य
इस भीषण आपदा में नगर के 2282 मकान धराशायी हो गए। अनेक परिवारों का आशियाना पलभर में मिट्टी में मिल गया। बाढ़ के तेज बहाव में 142 लोगों की मृत्यु हो गई। लाखों रुपये मूल्य का अनाज, गृहस्थी का सामान, पशुधन और अन्य संपत्ति प्रचंड जलधारा में बह गई। सौभाग्य की बात केवल इतनी थी कि यह प्रलय दिन के उजाले में आया था, जिससे लोगों को बचने और दूसरों की सहायता करने का कुछ अवसर मिल गया था। उस समय रीवा के शासक महाराज व्यंकट रमण सिंह नाबालिग थे, राज्य शासन का प्रबंध दीवान पंडित हेतराम के नेतृत्व वाले मंत्रीमंडल के हाथ में था। इस आपदा के काल में दीवान साहब ने स्वयं राहत और बचाव कार्य की कमान संभाली और मैदान में उतरे। संकट की घड़ी में हाथीखाने के सभी छः हाथियों को तत्काल बाहर निकालकर बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में भेजा गया। कहीं कोई व्यक्ति आधे ढहे मकान की छत पर बैठा जीवन की आस लगाए था, तो कोई उखड़ते हुए पेड़ की शाखा पकड़कर प्रचंड धारा से संघर्ष कर रहा था। हाथियों की सहायता से ऐसे लोगों को एक-एक कर सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाया गया। जहाँ हाथी नहीं पहुँच सकते थे, वहाँ नावों का सहारा लिया गया। नावों को मोटे रस्सों से बाँधकर उफनती धारा में उतारा जाता और उनमें फँसे लोगों को बैठाकर किनारे तक खींचा जाता। यह राहत अभियान कई दिनों तक लगातार चलता रहा और हजारों लोगों की जान बचाई गई।
बाढ़ पीड़ितों को दी गई आर्थिक सहायता
इस विनाशकारी बाढ़ का प्रभाव केवल आवासों तक सीमित नहीं रहा। राजधानी रीवा की डिस्पेंसरी भी बाढ़ की चपेट में आकर ढह गई। उसके साथ वहाँ रखी दवाइयाँ औषधीय सामग्री और चिकित्सा उपकरण भी नष्ट हो गए। किंतु प्रशासन ने शीघ्र ही वैकल्पिक व्यवस्था की और नगर से बाहर एक अस्थायी अस्पताल स्थापित किया गया। और इस अस्पताल में रोगियों और पीड़ितों का उपचार किया गया जो उस समय के लिए एक अत्यंत बड़ी मानवीय सेवा थी। बाढ़ का पानी उतर जाने के बाद भी राहत कार्य लंबे समय तक जारी रहा। प्रभावित परिवारों को भोजन के लिए चना-चबैना और अन्न-गल्ला के साथ ही कपड़े, बिछौने तथा आर्थिक सहायता प्रदान की गई। रीवा राज्य ने अपने सीमित संसाधनों के बावजूद पीड़ितों के पुनर्वास का हर संभव प्रयास किया। यह महाविभीषिका आज भी रीवा के इतिहास में प्रकृति के सबसे भयानक प्रकोपों में गिनी जाती है।यह वह दिन था जब उफनती जलधारा के सामने पूरा नगर असहाय दिखाई दिया, लेकिन साथ ही यह वह अवसर भी था जब मानवीय साहस और शासन की संवेदना ने हजारों लोगों को बचाकर इतिहास में एक प्रेरक अध्याय भी जोड़ दिया।
अतीत से सीख लेने की जरूरत
बारिश का सुहावन मौसम अपने साथ हरियाली, ठंडक और नई उम्मीदें लेकर आता है। लेकिन जब बादल लगातार बरसते हैं और बीहर-बिछिया समेत आसपास के नदी-नाले जब अपने रौद्र रूप में आने लगती हैं, तो लोगों की यादों में अतीत की वे भयावह बाढ़ें फिर से तैरने लगती हैं, जिन्होंने कभी पूरे शहर को संकट में डाल दिया था। बाढ़ जैसी आपदा के लिए केवल प्रकृति को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कहीं न कहीं हम भी इसके लिए जिम्मेदार है।नदियों के प्राकृतिक प्रवाह मार्ग में अवैध निर्माण और अतिक्रमण करके, प्रकृति की सीमाओं की अनदेखी करके उनके जल निकासी मार्गों को अवरुद्ध कर देते हैं, इसीलिए हमें भी अपनी सीमाओं को याद रखना चाहिए। इसलिए आवश्यक है कि हम अतीत की त्रासदियों को केवल याद ही न करें, बल्कि उनसे सबक लेकर भविष्य के लिए पूरी सावधानी और तैयारी के साथ सजग भी रहें।

