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पांढुर्णा के गोटमार मेले में 1029 घायल, कांग्रेस विधायक भी पत्थरबाजी में दिखे

पांढुर्णा। मध्य प्रदेश के पांढुर्णा में शुक्रवार को गोटमार मेले के दौरान जमकर पत्थरबाजी हुई। जाम नदी के तट पर पांढुर्णा और सावरगांव के लोग आमने-सामने रहे। परंपरा के तहत दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर पत्थर फेंके। इस दौरान 1029 लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई है।

घायलों में कई लोगों के सिर पर गंभीर चोटें आईं। कुछ लोगों के हाथ-पैर में भी चोट लगी है। घायलों को इलाज के लिए स्थानीय स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में पहुंचाया गया।

इस बार मेले से जुड़ा एक वीडियो और कुछ तस्वीरें भी सामने आई हैं। इनमें पांढुर्णा के कांग्रेस विधायक के पत्थरबाजी में शामिल होने की चर्चा है। वीडियो सामने आने के बाद विधायक की भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस शुरू हो गई है।

झंडे पर कब्जे की परंपरा, फिर शुरू होती है पत्थरबाजी

गोटमार मेले के दौरान जाम नदी के बीच पलाश का पेड़ लगाया जाता है। इस पर झंडा बांधा जाता है। इसके बाद पांढुर्णा और सावरगांव पक्ष के लोग झंडे पर कब्जा करने के लिए आमने-सामने आते हैं।

परंपरा के अनुसार पांढुर्णा पक्ष झंडे को तोड़कर अपने कब्जे में लेने की कोशिश करता है। सावरगांव पक्ष झंडे को बचाने के लिए सामने से पत्थर चलाता है। इसके बाद दोनों तरफ से लगातार पत्थरबाजी होती है। जिला प्रशासन के मुताबिक, आयोजन जाम नदी के तट पर होता है। मेले के अंत में पलाश के झंडे को मां चंडिका मंदिर में अर्पित किया जाता है।

सिर में चोट, हाथ-पैर में फ्रैक्चर

पत्थरबाजी के दौरान बड़ी संख्या में लोग घायल हुए। कई लोगों के सिर में चोट लगी, जबकि कुछ लोगों के हाथ-पैर में फ्रैक्चर होने की जानकारी है। घायलों को इलाज के लिए स्वास्थ्य केंद्रों और अस्पतालों में भर्ती कराया गया। गंभीर हालत वाले मरीजों को जरूरत के अनुसार बड़े अस्पतालों में भेजा गया।

गोटमार मेले में हर साल पत्थरबाजी के कारण बड़ी संख्या में लोग घायल होते हैं। वर्ष 2025 के आयोजन में भी 900 से ज्यादा लोगों के घायल होने की रिपोर्ट सामने आई थी। उस दौरान कुछ गंभीर घायलों को नागपुर रेफर किया गया था।

300 साल से ज्यादा पुरानी मानी जाती है परंपरा

गोटमार मेले को पांढुर्णा की पुरानी परंपरा माना जाता है। इसके पीछे कई लोककथाएं प्रचलित हैं। सबसे ज्यादा बताई जाने वाली कहानी पांढुर्णा के एक युवक और सावरगांव की युवती से जुड़ी है।

मान्यता के मुताबिक, दोनों के प्रेम संबंध का विरोध हुआ था। दोनों गांवों के बीच हुए संघर्ष में प्रेमी युगल की मौत हो गई। इसके बाद उनकी याद में गोटमार मेले की परंपरा शुरू होने की बात कही जाती है। हालांकि, इस कहानी के ऐतिहासिक प्रमाण को लेकर अलग-अलग मत हैं।

प्रशासन ने पहले से किए थे सुरक्षा इंतजाम

मेले को देखते हुए प्रशासन ने पुलिस बल के साथ स्वास्थ्य टीम और एंबुलेंस तैनात की थी। निगरानी के लिए भी इंतजाम किए गए थे। आयोजन से पहले प्रशासन ने लोगों से शांतिपूर्ण तरीके से परंपरा निभाने की अपील की थी। गोफन के इस्तेमाल पर रोक लगाने की बात भी कही गई थी। प्रशासन ने नदी के बीच लगाए जाने वाले झंडे को सूर्यास्त से पहले तोड़कर आयोजन खत्म करने की अपील की थी।

1955 से अब तक 14 मौतों का दावा

गोटमार मेले में होने वाली पत्थरबाजी को लेकर लंबे समय से विवाद रहा है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, 1955 से अब तक इस आयोजन के दौरान 14 लोगों की मौत हो चुकी है।

इसके बावजूद स्थानीय लोग इसे अपनी परंपरा और आस्था से जोड़कर देखते हैं। हर साल प्रशासन सुरक्षा व्यवस्था बढ़ाता है, लेकिन पत्थरबाजी की इस परंपरा को पूरी तरह रोकना अब भी चुनौती बना हुआ है।

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